Sunday, September 6, 2009

खुद पर यकीन आते सुकूं उसको मिल गया

या मैं बदल गया हूं या फिर वो बदल गया ।
से मेरा सोच मुझसे भी आगे निकल गया ।।

जब तक था वो नादान तो गफ़लत में मै भी था ,
जब उसके होश सम्हले तो मैं भी सम्हल गया ।।

कल उंगलियां पकड़ के भी गिरता था बार बार ,
ये वो ही है जो हाथ लगाते उछल गया ।।

पहले तो मुंह में रखके चबाता था सोजोगम ,
इस बार वो तमाम रंजिशें निगल गया ।।

अब पूछता नहीं है सुकूं कैसे आएगा ,
खुद पै यक़ीन आते सुकूं उसको मिल गया ।।

वो पौधे जो ‘ज़ाहिद‘ ने लगाए थे रेत पर ,
उनमें से एक पौधा बड़ा होके फल गया ।।
120496

11 comments:

  1. कल उंगलियां पकड़ के भी गिरता था बार बार ,
    ये वो ही है जो हाथ लगाते उछल गया ।।

    wah, bahut khoob , blog jagat men swagat hai.

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  2. इस बार वो तमाम रंजिशें निगल गया ।
    बहुत अच्छा लिखा है जाहिद भाई। अच्छा ये बताएं कि यह कुमार जाहिद है या खुमार जाहिद है...
    मेरे ब्लॉग पर भी आएं।

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  3. बेहतरीन …………सुन्दर रचना ।
    चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

    गुलमोहर का फूल

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  4. Bahut Barhia... aapka swagat hai...isi tarah likhte rahiye...

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  5. sir ,, sher bahut hi khubsurat hue hai .isko gazal is nahi kah sakte kyoki gazal me 5,7,9,11 aese sher hote hai .
    wese in sab baato ko me darkinaar karu or aaraam se padu to ye rachna waakayi lajawaab hai or aap achche gyaani lagte hai aapko ye sab samjhna bhi achcha nahi kuch anjaane me uch-nich hui ho to maaf karna,

    Deepak "bedil"

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  6. चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है....
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  7. बहुत खूब जनाब | लाजवाब | लिखते रहिये | ब्लोगिस्तान में आपका स्वागत है

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  8. bhaut sunder rachna hai

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  9. bahut khub likha hai...
    जब तक था वो नादान तो गफ़लत में मै भी था
    wakaee...
    uski nadani se hmare hoshiyari ne b liya hai sabak...
    ab wo asal me nadaan hai aur hum bane nadan hoshiyar....
    bahut achhi lagti hai aapki gazalen....

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  10. sabhi ka shukriya ..
    ghazal ka ganit padha nahin...dil ko ganit banaun to chalun...is dang se bhi sochunga...agar sheron ki ginti se ghazal ki bharti haa to qazi ko beemar nahin padhana chahiye...kalma padhan chahiye..
    mein Kumar Zahid.

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