Saturday, May 8, 2010

जिन्दगी खटनी

कुछ दोस्तों को नयी पोस्ट का बेसब्री से इंतज़ार था इसलिए इसे सब्र से पढ़ें



सिल-बटे पर है हिना-सी हर खुशी बटनी।
उम्र मेरी जान ! वर्ना यूं नहीं कटनी ।।

जिन्दगी भर सब्र के पत्थर रखो दिल में,
बदगुमां ये खाइयां ऐसे नहीं पटनी।।

यह दिया संतोष का यूं ही नहीं जलता ,
रेशा रेशा सांस से बत्ती पड़ी अटनी।।

है खिंची रस्सी हवा में आजमाइश की ,
हाथ खोले चल रही है वक्त की नटनी ।।

वह जो परदे से लगी चिपकी खड़ी दिखती ,
आस की ज़िद से भरी है , वह नहीं हटनी।।

घर में सबके मुंह में वह पानी बनी फिरती ,
चटपटी ,तीखी ,सलोनी आम की चटनी।।

आंख भर उसको कभी ‘ज़ाहिद’ नहीं देखा ,
एक पल ठहरी नहीं यह जिन्दगी खटनी।।
1 मई 2010

हिना: मेंहदी ,/ बटनी: बांटनी ,
पटनी: पाट दी जानी ,/ बदगुमां-मिथ्याभिमान ,
अटनी: आटना ,अटना, धागे को गुंथना,
खटनी: खटनेवाली,खटना शब्द से बनी संज्ञा,
रेशा रेशा >रेशः रेशः = एक एक तार,फाइबर

15 comments:

  1. सिल-बटे पर है हिना-सी हर खुशी बटनी।
    उम्र मेरी जान ! वर्ना यूं नहीं कटनी ।।

    जिन्दगी भर सब्र के पत्थर रखो दिल में,
    बदगुमां ये खाइयां ऐसे नहीं पटनी।।
    Rashk hota hai..kaise itna sundar likh lete hai aap!
    Maatru diwas mubarak ho..zindagi bhar!

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  2. क्षमाजी ,
    मां शब्द बहुत भावुक बनाता है ..मुझे .....क्योंकि मैंने मां को दुखी होते देखा है..

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  3. wah zahid ji,, aapki is rachna ko paddh kar sach much mann bada prassann hua, bahut he achcha likha hai aapne, bahut khub!





    amit~~

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  4. जनाब! बहुत उम्दा!
    इंतज़ार सफल हो गया। आपकी ग़ज़ल लाजवाब है, बस टाइपोग्राफ़िकल त्रुटि है एक कि रेशा-रेशा की जगह रेसा-रेसा हो गया है, सुधार लें कृपया।
    माँ पर एक रचना पोस्ट करके आया हूँ और आपकी टिप्पणी से याद आई ये बात, संगम-तीरे पर जाकर देखिएगा यदि समय मिले।
    (sangam-teere.blogspot.com)
    ग़ज़ल में एकाध शे'र से लोग काम निकाल लेते हैं, यहाँ तो पाँच शे'र लाजवाब हैं सात में से - और बाक़ी दो भी कम नहीं। किसे ज़्यादा अच्छा कहूँ? फिर भी मुझे नटनी वाला शे'र और रेशा-रेशा वाला शे'र तो कमाल का ही लगे है।
    धुंध जब आ ही गई दर्म्यान रिश्तों के-
    धूप कितनी नेह दे ले, वह नहीं छँटनी
    माफ़ कीजिएगा, उस स्तर का नहीं है, मगर यह मेरा फूल है जो पेश किया मैंने इस ग़ज़ल को…

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  5. हिमांशु भाई,
    आपकी इस कदर बारीक निगहबानी का कायल हूं।

    और
    इतनी बढ़ी उमीद कि घर आसमां हुए
    तारों भरी उजास की चादर नहीं हटनी

    ऊपर से आपका कद्दावर शे‘र कि

    धुंध जब आ ही गई दर्म्यान रिश्तों के-
    धूप कितनी नेह दे ले, वह नहीं छँटनी

    वाकई

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  6. हिमांशु भाई,
    हां क़ायदे से रेशा रेशा ...... और साफ़ तौर पर रेशः रेशः होना चाहिए मगर अब बत्ती कही है तो लोगों की ज़बान में रेसा रेसा ही चले यह सोचा, अगर दानिशमंद इज़ाजत दे तो !

    बहरहाल अल्लमा इक़बाल साहब का शेर अर्ज है

    आदमी के रेशे रेशे में समा जाता है इश्क़
    शाखेगुल में जिस तरह बादेसहरगाही का नम ।

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  7. wah ustad ji..kalam ka jadoo chalta hai :)

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  8. सुन्दर लयबद्धता के साथ तथ्यों को बयान किया है ।
    सिल-बटे पर है हिना-सी हर खुशी बटनी।
    उम्र मेरी जान ! वर्ना यूं नहीं कटनी ।।
    क्या बात कही है !

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  9. है खिंची रस्सी हवा में आजमाइश की ,
    हाथ खोले चल रही है वक्त की नटनी

    वाह
    एक अनोखा लेकिन असरदार शेर ...
    ग़ज़ल में स्वाभाविकता का पुट ही
    ग़ज़ल के इतना प्रभावशाली होने का
    कारण बन पडा है
    आपकी पुख्ता सोच
    आपके सतत अध्ययन को दर्शाती है
    बधाई स्वीकारें

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  10. ek alag sa andaaj hai aapka..achcha laga padhna.

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  11. रेज़: रेज़: या रेज़ा-रेज़ा भी चल सकता है, बहुत बारीक़ फ़र्क़ है दोनों में, और ज़ाहिद साहब, ये बत्ती के साथ भी बख़ूबी चलेंगे। मगर साहब, ये जो मैं अपनी समझ की टीप लगा जाता हूँ सो इस स्वार्थ से कि आप भी जहाँ मुझे गड़बड़ाते देखें, टोक दें, हिदायत कर दें - जिससे मैं भी रास्ते पे रहूँ। बड़ी गुंजाइश रहती है भटकन की।
    बहुत उम्दा ग़ज़ल है, दोबारा पढ़ी तो दुगना मज़ा दे गयी। ऊपर से बोनस मिला - आपकी टिप्पणी, और उसमें दो अच्छे शे'र। इक़बाल साहब ने भी बड़ी महीन कही है… बादे-सहरगाही का नाम क्या समोया है शाख़े-गुल में।
    वाह! शुक्रिया।

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  12. जिन्दगी भर सब्र के पत्थर रखो दिल में,
    बदगुमां ये खाइयां ऐसे नहीं पटनी।।

    यह दिया संतोष का यूं ही नहीं जलता ,
    रेशा रेशा सांस से बत्ती पड़ी अटनी।।
    है खिंची रस्सी हवा में आजमाइश की ,
    हाथ खोले चल रही है वक्त की नटनी ।।

    वह जो परदे से लगी चिपकी खड़ी दिखती ,
    आस की ज़िद से भरी है , वह नहीं हटनी।।



    अत्यंत प्रभावशील शेर
    वाह!! बधाई

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  13. जिन्दगी भर सब्र के पत्थर रखो दिल में,
    बदगुमां ये खाइयां ऐसे नहीं पटनी।।

    है खिंची रस्सी हवा में आजमाइश की ,
    हाथ खोले चल रही है वक्त की नटनी ।।

    आंख भर उसको कभी ‘ज़ाहिद’ नहीं देखा ,
    एक पल ठहरी नहीं यह जिन्दगी खटनी।।


    साहब!
    पूरी ज़िदगी को आपने जैसे बहुत गहरे से खींचकर बाहर निकाला है। बधाई / इतनी सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई/

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  14. जिन्दगी भर सब्र के पत्थर रखो दिल में,
    बदगुमां ये खाइयां ऐसे नहीं पटनी।।...बेहद गंभीर बात ...दिल को छू गई बधाई

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