Tuesday, October 13, 2009

अक्ल के अंधे

नींद आती नहीं है ,ख्वाब दिखाने आए ।।
अक्ल के अंधे गई रात जगाने आए ।।

जिस्म में जान नहीं है मगर रिवाज़ तो देख ,
चल के वैशाखी में ये देश चलाने आए ।।

बीच चैराहे में फिर कोई मसीहा लटका ,
मुर्दे झट जाग उठे ,लाश उठाने आए ।।

जिसको बांहों में ,बंद मुट्ठियों में रखना है ,
ऐसी इक चीज़ को ये अपना बनाने आए।।

कुुछ गए साल गए वक़्त का खाता लेकर ,
मेरे नामे पै चढ़ा क़र्ज़ बताने आए ।।

सर पै ’जाहिद’के हादिसों की यूं लाठी टूटी ,
जैसे अब सरफिरे की अक्ल ठिकाने आए ।।

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. दोस्तों ! दिवाली की ढेरों शुभकामनाएं
    कृपया ऐसी ही हौसलाअफजाई करते रहें

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  4. abhut achi gazal hai badhaayee ho

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