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Sunday, December 11, 2011

घायल सा इक ख़त




बहुत दिनों जब कुछ ना बोली सीली सी तनहाई।
दबे हुए कुछ सपने खोले उनको धूप दिखाई।।

कुछ खट्टे पल शिकवों की फफूंद खाए थे,
हाथ फेरकर उनका पोंछा फिर कुछ रगड़ लगाई।

कुछ सतरें अब भी आंसू की गंध लिए थीं,
मिटे हुए कुछ हर्फ़ो से यादें रिस आईं।

घायल सा इक ख़त जमीन पर फिसल जा गिरा,
तड़प रही थी उसमें, उसकी, सहमी सी रुसवाई।

टूटे हाथ लगाते जैसे गलत फैसले ,
उन वर्क़ों का क्या होना था ‘ज़ाहिद’ आग लगाई।

01.12.11,

Friday, November 25, 2011

कौली कौली धूप


सुबह जगाने आ जाती है, मुस्काती, मुंहबोली धूप।
कभी आलता, कभी अल्पना, लगती कभी रंगोली धूप।।

धुंधों कोहरों के सब कपड़े, जाने कहां उतारे हैं ,
चुंधिआई आंखों के आगे, नहा रही है भोली धूप।।

अंजुरी में भरकर शैफाली, कभी मोंगरे, कभी गुलाब,
कमरे में खुश्बू फैलाती है फूलों की डोली धूप।।

अगहन की अल्हड़ गोरी है, है पुआल यह पूसों की,
सावन भादों में करती है हम से आँख मिचोली धूप।।

आंगन आंगन जलते चूल्हे, आंगन आंगन पकते रूप,
आंगन आंगन करती फिरती, खुलकर हंसी ठिठौली धूप।।

उसका चेहरा बहुत दिनों से देख नहीं पाया हूं मैं,
आज हथेली पर रख ली है मैंने कौली कौली धूप।।

खेतों की है लुक्का छुप्पी, पेड़ों की है धूम धड़ाम,
‘ज़ाहिद’ से ही झीना झपटी करती धौली धौली धूप।।




कौली कौली - नर्म नर्म, (खासकर ताज़ा कोंपलों,  फूलों सब्जियों या वनस्पतियों के लिए)
धौली धौली - उजली, सफेद सफ्फाक,


19-11-11