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Thursday, February 28, 2013

कोई हिम्मत से आए जाए तो।




देर से आए मगर आए तो।
नाज़ से वो गले लगाए तो।

मेरी तबियत भी है फरेबफहम1,
ख़्वाब कोई ज़रा सजाए तो।

हम कहां होशमंद2 रहते हैं,
उनको कोई खबर सुनाए तो।

किसका दर है ये दारीचा3 किसका,
हम कहां हैं कोई बताए तो।

कौन कहता है हम नहीं बदले,
अब कोई आइना दिखाए तो।

ये गली अब भी आशना4 है हुजूर!
कोई हिम्मत से आए जाए तो।

यूं कि अब भी वहीं पै हैं ‘ज़ाहिद’
आके कोई कभी उठाए तो।
09.02.13

1. धोके में जीने वाला, कल्पनाजीवी, 2. होश में, चैतन्य, 3. गलियां, राहदारी, 4. स्नेहिल, चाहनेवाली,


Tuesday, January 3, 2012

मत रख कंधों की आस।



एक झटके में नया साल आ गया। पिछले साल ने अभी अपनी अस्तव्यस्त दूकान उठाई भी नहीं कि अपनी दूकान लेकर नया साल आ गया...आओ स्वागत है साल 2012


सभी दोस्तों और अदीब साहबानों को नया साल मुबारक।  
 कुछ इस तरह




जिसकी आंखों में अपनापन अधरों सुखद सुहास।
दुनिया भर में सबसे ज्यादा दौलत उसके पास।

सिक्कों की खन खन में उसको नींद नहीं आती,
टकसालों के निकट बनाया जिसने भी आवासA

रोज़ जगाने चल पड़ता है भोर में बस्ती को,
इक दिन कट जायेगा मुर्ग़ा, उसे नहीं आभास।

खुश होता है लपट झपटकर, खीसें दिखलाता,
कूद फांद डाली डाली की बन्दर का अभ्यास।

भले मौसमी बादल से सूरज छिप जाता है,
लेकिन क्या मर जाता इससे पीला पड़ा प्रकाश?

खोल रहा है नया द्वार वह बंद कोठरी में,
हुनरमंद के हाथ हथौड़ा पकड़ाता संत्रास।

तू कपूर की काया कर ले, कस्तूरी का मन,
‘ज़ाहिद’ मुर्दा लोगों से मत रख कंधो की आस।


मंगलवार 3.1.12

Sunday, December 11, 2011

घायल सा इक ख़त




बहुत दिनों जब कुछ ना बोली सीली सी तनहाई।
दबे हुए कुछ सपने खोले उनको धूप दिखाई।।

कुछ खट्टे पल शिकवों की फफूंद खाए थे,
हाथ फेरकर उनका पोंछा फिर कुछ रगड़ लगाई।

कुछ सतरें अब भी आंसू की गंध लिए थीं,
मिटे हुए कुछ हर्फ़ो से यादें रिस आईं।

घायल सा इक ख़त जमीन पर फिसल जा गिरा,
तड़प रही थी उसमें, उसकी, सहमी सी रुसवाई।

टूटे हाथ लगाते जैसे गलत फैसले ,
उन वर्क़ों का क्या होना था ‘ज़ाहिद’ आग लगाई।

01.12.11,