कुछ दोस्तों को नयी पोस्ट का बेसब्री से इंतज़ार था इसलिए इसे सब्र से पढ़ें
सिल-बटे पर है हिना-सी हर खुशी बटनी।
उम्र मेरी जान ! वर्ना यूं नहीं कटनी ।।
जिन्दगी भर सब्र के पत्थर रखो दिल में,
बदगुमां ये खाइयां ऐसे नहीं पटनी।।
यह दिया संतोष का यूं ही नहीं जलता ,
रेशा रेशा सांस से बत्ती पड़ी अटनी।।
है खिंची रस्सी हवा में आजमाइश की ,
हाथ खोले चल रही है वक्त की नटनी ।।
वह जो परदे से लगी चिपकी खड़ी दिखती ,
आस की ज़िद से भरी है , वह नहीं हटनी।।
घर में सबके मुंह में वह पानी बनी फिरती ,
चटपटी ,तीखी ,सलोनी आम की चटनी।।
आंख भर उसको कभी ‘ज़ाहिद’ नहीं देखा ,
एक पल ठहरी नहीं यह जिन्दगी खटनी।।
1 मई 2010
हिना: मेंहदी ,/ बटनी: बांटनी ,
पटनी: पाट दी जानी ,/ बदगुमां-मिथ्याभिमान ,
अटनी: आटना ,अटना, धागे को गुंथना,
खटनी: खटनेवाली,खटना शब्द से बनी संज्ञा,
रेशा रेशा >रेशः रेशः = एक एक तार,फाइबर
Saturday, May 8, 2010
Wednesday, April 28, 2010
चाह हो तो मैं हिमालय से पिघलकर आउंगा ।।
ख्वाब तुम देखो कि मैं नभ पर चमककर छाउंगा ।।
प्यार की बदली बनूंगा , आंख में भर जाउंगा ।।
इतने स्थापित हो तुम कि चाहकर ना हिल सको ,
मैं हवा हूं सांस भी खींचो तो खिंचकर आउंगा ।।
मैं तली में याद के टुकड़े की मानिंद हूं पड़ा ,
तुम खंगालोगे तो मैं उठकर सतह पर आउंगा ।।
इम्तिहां की राह में दीवार ना पैदा करो ,
चाह हो तो मैं हिमालय से पिघलकर आउंगा ।।
हज़ से लौटा हूं अभी ‘जाहिद’ अभी प्याला न दो ,
चार छः दिन ज़्यादा से ज़्यादा सबर कर पाउंगा ।।
4.3.10/11.03.10
प्यार की बदली बनूंगा , आंख में भर जाउंगा ।।
इतने स्थापित हो तुम कि चाहकर ना हिल सको ,
मैं हवा हूं सांस भी खींचो तो खिंचकर आउंगा ।।
मैं तली में याद के टुकड़े की मानिंद हूं पड़ा ,
तुम खंगालोगे तो मैं उठकर सतह पर आउंगा ।।
इम्तिहां की राह में दीवार ना पैदा करो ,
चाह हो तो मैं हिमालय से पिघलकर आउंगा ।।
हज़ से लौटा हूं अभी ‘जाहिद’ अभी प्याला न दो ,
चार छः दिन ज़्यादा से ज़्यादा सबर कर पाउंगा ।।
4.3.10/11.03.10
Tuesday, April 6, 2010
शख्स की तलाश
ऐलानेख़ासोआम बहुत खास दोस्तों !!
कोई नहीं फटकता आसपास दोस्तों !!
अफ़सर ,नुमाइंदे ,इज़ारेदार ,तनखि़ये ,
सबके अलग अलग हैं यां लिबास दोस्तों !!
दिल के नहीं दिमाग़ के रिश्तें हैं आजकल ,
सबकी टिकी है फ़ायदों में सांस दोस्तों !!
कानून क़त्लगाह है, इंसाफ़ है चारा,
संसद का तामझाम है बकवास दोस्तों !!
जिस शख्स की तलाश में ‘ज़ाहिद’ है दरबदर ,
उसको नहीं इस बात का अहसास दोस्तों !!
17.11.09/100310/11.03.10
ऐलानेख़ासोआम: विशेष और साधारणों के लिए घोषणा
कत्लगाह: बूचड़खाना ,
चारा: लोभ ,प्रलोभन ,
कोई नहीं फटकता आसपास दोस्तों !!
अफ़सर ,नुमाइंदे ,इज़ारेदार ,तनखि़ये ,
सबके अलग अलग हैं यां लिबास दोस्तों !!
दिल के नहीं दिमाग़ के रिश्तें हैं आजकल ,
सबकी टिकी है फ़ायदों में सांस दोस्तों !!
कानून क़त्लगाह है, इंसाफ़ है चारा,
संसद का तामझाम है बकवास दोस्तों !!
जिस शख्स की तलाश में ‘ज़ाहिद’ है दरबदर ,
उसको नहीं इस बात का अहसास दोस्तों !!
17.11.09/100310/11.03.10
ऐलानेख़ासोआम: विशेष और साधारणों के लिए घोषणा
कत्लगाह: बूचड़खाना ,
चारा: लोभ ,प्रलोभन ,
Saturday, March 13, 2010
काश मैं बहती हुई धारा से गागर खींचता ।।
कितनी कितनी दूर की नदियों को सागर खींचता ।।
रूप ,धन ,वैभव नहीं ,सबको ही आदर खींचता ।।
लफ़्ज़ मेरे हलक़ से यूं शायरी को खींचते ,
जैसे चारा मछली को पानी के बाहर खींचता ।।
इस कदर है अपने ढंकने की ज़माने को फिक़र ,
नींद में भी ,जो है अपना , वो ही चादर खींचता।।
हर कुएं सूने दिखे यां हर नदी सूखी मिली ,
काश मैं बहती हुई धारा से गागर खींचता ।।
डूबते हैं आंख में अरमान इस उम्मीद से ,
कोई तो ‘ज़ाहिद’ मिरे बाजू़ को आकर खींचता ।।
04.03.10/11.03.10/
रूप ,धन ,वैभव नहीं ,सबको ही आदर खींचता ।।
लफ़्ज़ मेरे हलक़ से यूं शायरी को खींचते ,
जैसे चारा मछली को पानी के बाहर खींचता ।।
इस कदर है अपने ढंकने की ज़माने को फिक़र ,
नींद में भी ,जो है अपना , वो ही चादर खींचता।।
हर कुएं सूने दिखे यां हर नदी सूखी मिली ,
काश मैं बहती हुई धारा से गागर खींचता ।।
डूबते हैं आंख में अरमान इस उम्मीद से ,
कोई तो ‘ज़ाहिद’ मिरे बाजू़ को आकर खींचता ।।
04.03.10/11.03.10/
Tuesday, March 2, 2010
साझे में नफ़रत
मैं जिन आंखों में मिल जाती मुहब्बत बस पिया करता।
कहां रंजेजफ़ा , फ़िक्रेतग़ाफुल मैं किया करता ।।
जहालत ही जहालत है , ज़हानत में जमाने की ,
मैं सदमे सह लिया करता , मैं आंसू पी लिया करता।।
नहीं रहबर हैं राहों में , रिवाजेरहज़नी हर सू ,
सभी धकियाते चलते हैं , मैं फिर भी चल लिया करता ।।
यहां साझे में नफ़रत होती है तो ख़ूब होती है।
कहीं भी प्यार साझे में कहां कोई किया करता।।
किसी से क्या करूं शिकवा ,किसे चिन्ता किसी की है ,
कभी ‘ज़ाहिद’ ज़ुबां खुलती तो उसको सी लिया करता ।।
190210
रंजेजफ़ा - जफ़ा का रंज, सितम का दुख।
फ़िक्रेतग़ाफुल - उपेक्षा की चिंता, वेतवव्जुही की परवाह।
जहालत - मूर्खता ,बेवकूफ़ी।
ज़हानत - ज़हन की तेज़ी, बौद्धिकता।
रहबर /राहबर- पथप्रदर्शक, अगुआ।
रिवाजेरहज़नी - रास्ते में लूट लेने का रिवाज।
हर सू - हर तरफ।
कहां रंजेजफ़ा , फ़िक्रेतग़ाफुल मैं किया करता ।।
जहालत ही जहालत है , ज़हानत में जमाने की ,
मैं सदमे सह लिया करता , मैं आंसू पी लिया करता।।
नहीं रहबर हैं राहों में , रिवाजेरहज़नी हर सू ,
सभी धकियाते चलते हैं , मैं फिर भी चल लिया करता ।।
यहां साझे में नफ़रत होती है तो ख़ूब होती है।
कहीं भी प्यार साझे में कहां कोई किया करता।।
किसी से क्या करूं शिकवा ,किसे चिन्ता किसी की है ,
कभी ‘ज़ाहिद’ ज़ुबां खुलती तो उसको सी लिया करता ।।
190210
रंजेजफ़ा - जफ़ा का रंज, सितम का दुख।
फ़िक्रेतग़ाफुल - उपेक्षा की चिंता, वेतवव्जुही की परवाह।
जहालत - मूर्खता ,बेवकूफ़ी।
ज़हानत - ज़हन की तेज़ी, बौद्धिकता।
रहबर /राहबर- पथप्रदर्शक, अगुआ।
रिवाजेरहज़नी - रास्ते में लूट लेने का रिवाज।
हर सू - हर तरफ।
Monday, February 22, 2010
जादुई पत्थर
मेरा दुश्मन बहुत चालाक ,हंसकर वार करता है।।
हमें जिस बात का डर है उसे इज़हार करता है।।
किसी का मैं नहीं हूं ,हो नहीं सकता , बताता है,
मैं जिनके दिल में हूं ,उनमें खड़ी दीवार करता है।।
मुसलसल ज़िन्दगी में क्यों लगी ठोकर बताता हूं ,
जमाना जादुई पत्थर से पथ तैयार करता है।।
हथेली पर हिना ,होंठों पै लाली , गाल पर सुर्ख़ी ,
शहर सारा कसाई की तरह श्रृंगार करता है।।
समझ आती नहीं है इश्क़ की तासीर कैसी है ,
कहीं सेहत बनाता है ,कहीं बीमार करता है।।
उसे पागल कहा जाता ,जो हंसता और रोता है
उसे दीवाना कहते हैं ,जो चुप दीदार करता है।।
यहां इंकार भी इक़रार है , इक़रार शुब्हा है ,
सज़ा ‘ज़ाहिद’ को होती है ,मज़ा संसार करता है।।
17.02.10
हमें जिस बात का डर है उसे इज़हार करता है।।
किसी का मैं नहीं हूं ,हो नहीं सकता , बताता है,
मैं जिनके दिल में हूं ,उनमें खड़ी दीवार करता है।।
मुसलसल ज़िन्दगी में क्यों लगी ठोकर बताता हूं ,
जमाना जादुई पत्थर से पथ तैयार करता है।।
हथेली पर हिना ,होंठों पै लाली , गाल पर सुर्ख़ी ,
शहर सारा कसाई की तरह श्रृंगार करता है।।
समझ आती नहीं है इश्क़ की तासीर कैसी है ,
कहीं सेहत बनाता है ,कहीं बीमार करता है।।
उसे पागल कहा जाता ,जो हंसता और रोता है
उसे दीवाना कहते हैं ,जो चुप दीदार करता है।।
यहां इंकार भी इक़रार है , इक़रार शुब्हा है ,
सज़ा ‘ज़ाहिद’ को होती है ,मज़ा संसार करता है।।
17.02.10
Tuesday, February 16, 2010
रास्ते मरमरी बांहें नहीं होते यारों !
जख्म जो दिल के छुपाने हों , मुस्कुराते चलो।
घोर बंजर में , बियाबां में लहलहाते चलो ।।
उम्र नाजुक है मगर दूर तलक जाएगी ,
बोझ कंधे बदल बदलके बस उठाते चलो ।।
रास्ते मरमरी बांहें नहीं होते यारों !
सम्हल सम्हल के चलो ,संतुलन बनाते चलो ।।
क़दम क़दम में यहां लोग-बाग भिड़ जाते ,
ये हैं अंधों का शहर लाठी ठकठकाते चलो ।।
मौत मंजर नहीं होती है, न सकते में रहो ,
कब्र के पास से गुजरो तो गुनगुनाते चलो ।।
शाख अच्छी नहीं लगती जो न झूमे झूले ,
तुम परिन्दों की तरह उड़ते चहचहाते चलो।।
क्यों रहें ख़ौफ़ के दरवाज़ों के पीछे ‘ज़ाहिद’,
हौसलों ! ज़ंग लगी कुंडी खड़खड़ाते चलो ।।
× कुमार ज़ाहिद ,मंगल ,16.02.10
घोर बंजर में , बियाबां में लहलहाते चलो ।।
उम्र नाजुक है मगर दूर तलक जाएगी ,
बोझ कंधे बदल बदलके बस उठाते चलो ।।
रास्ते मरमरी बांहें नहीं होते यारों !
सम्हल सम्हल के चलो ,संतुलन बनाते चलो ।।
क़दम क़दम में यहां लोग-बाग भिड़ जाते ,
ये हैं अंधों का शहर लाठी ठकठकाते चलो ।।
मौत मंजर नहीं होती है, न सकते में रहो ,
कब्र के पास से गुजरो तो गुनगुनाते चलो ।।
शाख अच्छी नहीं लगती जो न झूमे झूले ,
तुम परिन्दों की तरह उड़ते चहचहाते चलो।।
क्यों रहें ख़ौफ़ के दरवाज़ों के पीछे ‘ज़ाहिद’,
हौसलों ! ज़ंग लगी कुंडी खड़खड़ाते चलो ।।
× कुमार ज़ाहिद ,मंगल ,16.02.10
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