किसी के ख्याल से , पत्थर हुआ यह दिल पिघलता है।
नज़र के उठने गिरने से यहां मौसम बदलता है।
किसी की जुल्फ के साये में आकर ये समझ आया
लगी हो आग दिल में तो बदन सारा ही जलता है।
02.09.11
मुझे कुदरत की नेमत है, बड़े ईनाम लेता हूं।
बरसते हैं क़हर तो दौड़कर मैं थाम लेता हूं।
मुझे अफ़सोस है , सदमों से मैं बेहोश हो जाता ,
मगर जब होश आता है , तुम्हारा नाम लेता हूं।
02.09.11
फ़कीर होके न फाके़ किये ना मस्ती की।
किसी शहर में ना ठहरे न ठौरे बस्ती की।
न पैरहन ही संवारे न फ़िक्रेजुल्फ़ें की ,
तुम्हारी याद के सन्नाटों में गुमगस्ती की।
31.08.11
इस देश में आज़ादी पर पाबंदियां होने लगीं।
सागर ,धरा ,आकाश की हदबंदियां होने लगीं।
हद है कि होता सत्य का खुलकर यहां पै क़त्लेआम,
यह देखकर शहनाइंयां , सारंगियां रोने लगीं।
03.09.11
दिल हमारे साफ़ थे तो कैसे मैले हो गए
हम कभी पत्थर कभी मिट्टी के ढेले हो गए
जब अंधेरे थे तो सारे दोस्त-दुश्मन एक थे
अब उजालों में मिले तो सब अकेले हो गए।
16.09.11
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Wednesday, September 21, 2011
Sunday, May 22, 2011
बहुत उर्वर धरा है
हसीं है ज़िन्दगी , उसके लिए रोना भी पड़ता है।
उसी की मर्ज़ी जो चाहे , हमें होना ही पड़ता है।।
जिसे हम चाहें , अपना हो भी जाए ये नहीं सब कुछ ,
अगर कुछ पाना होता है तो कुछ खोना भी पड़ता है।।
बहुत उर्वर धरा है कुछ ना कुछ ऊगा ही करता है ,
मगर कुछ खास लेना हो तो फिर बोना ही पड़ता है।।
करे कोई , भरे कोई , ये क़िस्सा भी पुराना है ,
लगाता दाग़ दिल है , आंख को धोना ही पड़ता है।।
वो सारी रात मेरी बात पर हंसती रही लेकिन ,
सुबह बोली कि पगले रात में सोना भी पड़ता है।।
16.05.11
उसी की मर्ज़ी जो चाहे , हमें होना ही पड़ता है।।
जिसे हम चाहें , अपना हो भी जाए ये नहीं सब कुछ ,
अगर कुछ पाना होता है तो कुछ खोना भी पड़ता है।।
बहुत उर्वर धरा है कुछ ना कुछ ऊगा ही करता है ,
मगर कुछ खास लेना हो तो फिर बोना ही पड़ता है।।
करे कोई , भरे कोई , ये क़िस्सा भी पुराना है ,
लगाता दाग़ दिल है , आंख को धोना ही पड़ता है।।
वो सारी रात मेरी बात पर हंसती रही लेकिन ,
सुबह बोली कि पगले रात में सोना भी पड़ता है।।
16.05.11
Sunday, February 6, 2011
खूबसूरत हैं रियाया हिरनें
वार छुप छुप के किए जाते हैं
हम शिकारी हैं सच बताते हैं।
हर झपट्टा है पूरी ताक़त का
हम कभी मुफ़्त का ना खाते हैं।
खूबसूरत हैं रियाया हिरनें
भूख में हम ये भूल जाते हैं।
हम नहीं कहते कि डरकर रहिए
कब किसे आंख हम दिखाते हैं।
सारा जंगल है ख़ौफ़ का आलम
जो हैं गीदड़ वही बताते हैं।
हम सभी वक़्त के निवाले हैं
राहे दुनिया में आते जाते हैं।
मौक़ा ताक़त जुनूनोशौक़ोहवस
लफ़्ज़ सारे हमी बनाते हैं।।
06/07.02.11
हम शिकारी हैं सच बताते हैं।
हर झपट्टा है पूरी ताक़त का
हम कभी मुफ़्त का ना खाते हैं।
खूबसूरत हैं रियाया हिरनें
भूख में हम ये भूल जाते हैं।
हम नहीं कहते कि डरकर रहिए
कब किसे आंख हम दिखाते हैं।
सारा जंगल है ख़ौफ़ का आलम
जो हैं गीदड़ वही बताते हैं।
हम सभी वक़्त के निवाले हैं
राहे दुनिया में आते जाते हैं।
मौक़ा ताक़त जुनूनोशौक़ोहवस
लफ़्ज़ सारे हमी बनाते हैं।।
06/07.02.11
Sunday, October 10, 2010
चल किसी मोड़ पर चराग़ रखें
10.10.10. की शुभकामनाओं के साथ...
हक़ीम हो के जो दवा मांगे
गो कि तूफान भी हवा मांगे ।/1/
दिल मेरा चांद सितारे मांगे
मांग बेज़ा सही ,रवा मांगे ।/2/
रात की नीमजान खामोशी
गूंगे आकाश से सबा मांगे ।/3/
मेरी तन्हाइयों की परछाईं-
मेरी मायूसियां ,वबा मांगे ।/4/
चल किसी मोड़ पर चराग़ रखें
फ़िक्र में ख्वाहिशें कबा मांगे ।/5/
दुखती रग पर न कोई हाथ रखे
यक़ीन टूटे हैं ,ख़बा मांगे ।/6/
आज ‘ज़ाहिद’ से क्यों उमीदेवफ़ा
भूली बिसरी हुई नवा मांगे ? ।/7/
01.08.10
शब्दावली
बेज़ा = अपूरणीय , अनुचित ,
रवा = बजा , उचित , ठीक
सबा = सुबह की सुगंधित हवा, प्रातःसमीर ,
नीमजान = अर्द्धप्राण , अधमरी ,
वबा = महामारी ,क़यामत ,
कबा = चोगा , अंगरखा ,
ख़ौफ़ = भय , डर , अंदेशे
खबा = छुपाना ,गोपनीयता, एकांत
नवा = आवाज़, सदा ,
हक़ीम हो के जो दवा मांगे
गो कि तूफान भी हवा मांगे ।/1/
दिल मेरा चांद सितारे मांगे
मांग बेज़ा सही ,रवा मांगे ।/2/
रात की नीमजान खामोशी
गूंगे आकाश से सबा मांगे ।/3/
मेरी तन्हाइयों की परछाईं-
मेरी मायूसियां ,वबा मांगे ।/4/
चल किसी मोड़ पर चराग़ रखें
फ़िक्र में ख्वाहिशें कबा मांगे ।/5/
दुखती रग पर न कोई हाथ रखे
यक़ीन टूटे हैं ,ख़बा मांगे ।/6/
आज ‘ज़ाहिद’ से क्यों उमीदेवफ़ा
भूली बिसरी हुई नवा मांगे ? ।/7/
01.08.10
शब्दावली
बेज़ा = अपूरणीय , अनुचित ,
रवा = बजा , उचित , ठीक
सबा = सुबह की सुगंधित हवा, प्रातःसमीर ,
नीमजान = अर्द्धप्राण , अधमरी ,
वबा = महामारी ,क़यामत ,
कबा = चोगा , अंगरखा ,
ख़ौफ़ = भय , डर , अंदेशे
खबा = छुपाना ,गोपनीयता, एकांत
नवा = आवाज़, सदा ,
Sunday, September 26, 2010
रंगोफ़नोसुख़न के भी जागीरदार हैं
होंगे गुनाहगार तो मर जाएंगे ज़ाहिद ।
वर्ना हज़ार बार सर उठाएंगे ज़ाहिद ।।
सौ बार या हज़ार या लाखों करोड़ बार
हों आजमाइशें तो न घबराएंगे ज़ाहिद ।।
लगती है जानलेवा कलेजे में हरेक चोट
गो जानती है सख़्त हैं बच जाएंगे ज़ाहिद।।
मकतब की ज़िन्दगी के लिए वर्क़ कै़द हैं
ना जाने कब मिलेंगे या मिलवाएंगे ज़ाहिद।।
गूंगी ग़ज़ल को बारहा कहते हैं मुक़र्रर
अशआर के शऊर बिखर जाएंगे ज़ाहिद।।
अब भी दुआ सलाम में शामिल है सियासत
क्या अब यहां से साफ़ निकल पाएंगे ज़ाहिद।।
रंगोफ़नोसुख़न के भी जागीरदार हैं
इस गांव में आने से भी कतराएंगे ज़ाहिद।।
28.04.10/17.05.10
आजमाइशें ः कठिन परीक्षाएं
मकतब ः किताबघर, शाला , वाचनालय ,
वर्क़ ः पन्ने ,
बारहा ः बार बार ,
मुक़र्रर ः पुनः , एक बार फिर ,
अशआर ः शेर का बहुवचन ,
शऊर ः शिष्टाचार , लिहाज ,
सियासत ः राजनीति , बनावट , झूठ
रंगोफ़नोसुख़न ः चित्ररंगशाला ,कला क्षेत्र ,साहित्य-सृजन
जागीरदार ः क्षेत्र विषेश का अधिपति , मालिक ,
वर्ना हज़ार बार सर उठाएंगे ज़ाहिद ।।
सौ बार या हज़ार या लाखों करोड़ बार
हों आजमाइशें तो न घबराएंगे ज़ाहिद ।।
लगती है जानलेवा कलेजे में हरेक चोट
गो जानती है सख़्त हैं बच जाएंगे ज़ाहिद।।
मकतब की ज़िन्दगी के लिए वर्क़ कै़द हैं
ना जाने कब मिलेंगे या मिलवाएंगे ज़ाहिद।।
गूंगी ग़ज़ल को बारहा कहते हैं मुक़र्रर
अशआर के शऊर बिखर जाएंगे ज़ाहिद।।
अब भी दुआ सलाम में शामिल है सियासत
क्या अब यहां से साफ़ निकल पाएंगे ज़ाहिद।।
रंगोफ़नोसुख़न के भी जागीरदार हैं
इस गांव में आने से भी कतराएंगे ज़ाहिद।।
28.04.10/17.05.10
आजमाइशें ः कठिन परीक्षाएं
मकतब ः किताबघर, शाला , वाचनालय ,
वर्क़ ः पन्ने ,
बारहा ः बार बार ,
मुक़र्रर ः पुनः , एक बार फिर ,
अशआर ः शेर का बहुवचन ,
शऊर ः शिष्टाचार , लिहाज ,
सियासत ः राजनीति , बनावट , झूठ
रंगोफ़नोसुख़न ः चित्ररंगशाला ,कला क्षेत्र ,साहित्य-सृजन
जागीरदार ः क्षेत्र विषेश का अधिपति , मालिक ,
Saturday, August 28, 2010
हुनर कुछ भी नहीं है बस ज़रा औज़ारबाज़ी है,
परिन्दे हौसलों के आसमां को नाप आते हैं।
जहां तूफ़ान ने तोड़ा वहीं पर घर बनाते हैं।।
गो गिद्धों से भरी है खौफ़ की बेदर्द ये दुनिया,
हंसी होंठों पै लेकर हम जहां को मुंह चिढ़ाते हैं।।
उन्हें हर बात पर दुनिया के मर मिटने की हसरत है,
नज़र जब इश्क़ की पड़ती है तो नज़रें चुराते हैं।।
मुझे वो चाहते हैं बस ज़रा कहने से डरते हैं ,
मुहब्बत तोड़ती है दिल , सहमकर दिल बचाते हैं।
हुनर कुछ भी नहीं है बस ज़रा औज़ारबाज़ी है,
तुम्हारे ख्वाब के सोने से हम गहने बनाते हैं।।
यक़ीन है दोस्ती पर ,पर जरा दुनिया से डरते हैं
ये दुनिया दोस्तों की है , मेरे दुश्मन बताते हैं।
न फूलों के हसीं गुलशन ,ना बागीचे ,न दहकां हैं ,
पड़े बंजर में ‘ज़ाहिद’ मौज़ के कौवे उड़ाते हैं।।
27.07.10, 5810, 5.8.10
जहां तूफ़ान ने तोड़ा वहीं पर घर बनाते हैं।।
गो गिद्धों से भरी है खौफ़ की बेदर्द ये दुनिया,
हंसी होंठों पै लेकर हम जहां को मुंह चिढ़ाते हैं।।
उन्हें हर बात पर दुनिया के मर मिटने की हसरत है,
नज़र जब इश्क़ की पड़ती है तो नज़रें चुराते हैं।।
मुझे वो चाहते हैं बस ज़रा कहने से डरते हैं ,
मुहब्बत तोड़ती है दिल , सहमकर दिल बचाते हैं।
हुनर कुछ भी नहीं है बस ज़रा औज़ारबाज़ी है,
तुम्हारे ख्वाब के सोने से हम गहने बनाते हैं।।
यक़ीन है दोस्ती पर ,पर जरा दुनिया से डरते हैं
ये दुनिया दोस्तों की है , मेरे दुश्मन बताते हैं।
न फूलों के हसीं गुलशन ,ना बागीचे ,न दहकां हैं ,
पड़े बंजर में ‘ज़ाहिद’ मौज़ के कौवे उड़ाते हैं।।
27.07.10, 5810, 5.8.10
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