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Sunday, February 6, 2011

खूबसूरत हैं रियाया हिरनें

वार छुप छुप के किए जाते हैं
हम शिकारी हैं सच बताते हैं।

हर झपट्टा है पूरी ताक़त का
हम कभी मुफ़्त का ना खाते हैं।

खूबसूरत हैं रियाया हिरनें
भूख में हम ये भूल जाते हैं।

हम नहीं कहते कि डरकर रहिए
कब किसे आंख हम दिखाते हैं।

सारा जंगल है ख़ौफ़ का आलम
जो हैं गीदड़ वही बताते हैं।

हम सभी वक़्त के निवाले हैं
राहे दुनिया में आते जाते हैं।

मौक़ा ताक़त जुनूनोशौक़ोहवस
लफ़्ज़ सारे हमी बनाते हैं।।
06/07.02.11

Saturday, January 1, 2011

इश्क़ की ताज़ा कहानी बन

दोस्तों ! नया साल मुबारक !!

न तू इमदाद बन ,न तरस खा , ना मेहरबानी बन।
न आंसू की ज़ुबां बन , दर्द की ना तर्जुमानी बन।।

न बनना हीर ,लैला ,तू कभी ना सोहणी ,शीरीं ,
अगर सच्चा है दिल तो इश्क़ की ताज़ा कहानी बन।।

कि रो लेने दे सदियों या हज़ारों साल नर्गिस को ,
न झूठी खै़रख़्वाही बन ,न झूठी निगहबानी बन।।

उम्मीदों के यहां पर आसमां गुमनाम होते हैं ,
किसी ख़ामोश कोशिश की कभी ना नातवानी बन।।

यहां नक़ली मुखौटा ओढ़ना तहज़ीब है ‘ज़ाहिद’ ,
तू अपनी सादगी में रह , न झूठी बदगुमानी बन।।
24-25.02.10

इमदाद - सहायता
तर्जुमानी - अनुवादकला ,भाषान्तरण,
ख़ैरख़्वाही - शुभचिंतकत्व ,
नातवानी - क्षीण मनोबल ,हीनताबोध
तहजीब - सभ्यता ,
बदगुमानी - दर्प , अहंकार

Thursday, November 11, 2010

मुहब्बत के बूटे

दोस्तों आदाब! बहुत देर से आने की ग़ुस्ताख़ी मुआफ़ हो..कुछ है बात जो कभी ग़ज़ल में शाया होगी..इस नाच़ीज़ सी ग़ज़ल से शायद कुद संजीदाहाल खुले..


कभी बेवजह मुस्कुराकर तो देखो ।
खुशी के ख़ज़ाने लुटाकर तो देखो ।।

हरी रेशमी सांस की सरजमीं में ,
मुहब्बत के बूटे लगाकर तो देखो ।।

मसीहे मिलेंगे तुम्हें दोस्ती के ,
रकीबों को घर में बुलाकर तो देखो ।।

जवां ज़िन्दगी के तराने मिलेंगे ,
ख़्वाबों की तितली उड़ाकर तो देखो ।।

हमीं हैं , हमीं हैं , हमीं हम हमेशा ,
किताबों से गर्दे हटाकर तो देखा ।।

तुनकती हुई हर खुशी को खुशी से ,
ज़रा खींचकर गुदगुदाकर तो देखो ।।

बनेगी नयी लय सजेगा नया सुर ,
कि‘ज़ाहिद’ की धुन गुनगुनाकर तो देखो ।।
20.10.2010
कुछ दोस्तों के नये नये तकाज़ों के साथ ...कुछ और बातें ...पेश हैं

Sunday, October 10, 2010

चल किसी मोड़ पर चराग़ रखें

10.10.10. की शुभकामनाओं के साथ...


हक़ीम हो के जो दवा मांगे
गो कि तूफान भी हवा मांगे ।/1/

दिल मेरा चांद सितारे मांगे
मांग बेज़ा सही ,रवा मांगे ।/2/

रात की नीमजान खामोशी
गूंगे आकाश से सबा मांगे ।/3/

मेरी तन्हाइयों की परछाईं-
मेरी मायूसियां ,वबा मांगे ।/4/

चल किसी मोड़ पर चराग़ रखें
फ़िक्र में ख्वाहिशें कबा मांगे ।/5/

दुखती रग पर न कोई हाथ रखे
यक़ीन टूटे हैं ,ख़बा मांगे ।/6/

आज ‘ज़ाहिद’ से क्यों उमीदेवफ़ा
भूली बिसरी हुई नवा मांगे ? ।/7/

01.08.10

शब्दावली
बेज़ा = अपूरणीय , अनुचित ,
रवा = बजा , उचित , ठीक
सबा = सुबह की सुगंधित हवा, प्रातःसमीर ,
नीमजान = अर्द्धप्राण , अधमरी ,
वबा = महामारी ,क़यामत ,
कबा = चोगा , अंगरखा ,
ख़ौफ़ = भय , डर , अंदेशे
खबा = छुपाना ,गोपनीयता, एकांत
नवा = आवाज़, सदा ,

Saturday, August 28, 2010

हुनर कुछ भी नहीं है बस ज़रा औज़ारबाज़ी है,

परिन्दे हौसलों के आसमां को नाप आते हैं।
जहां तूफ़ान ने तोड़ा वहीं पर घर बनाते हैं।।

गो गिद्धों से भरी है खौफ़ की बेदर्द ये दुनिया,
हंसी होंठों पै लेकर हम जहां को मुंह चिढ़ाते हैं।।

उन्हें हर बात पर दुनिया के मर मिटने की हसरत है,
नज़र जब इश्क़ की पड़ती है तो नज़रें चुराते हैं।।

मुझे वो चाहते हैं बस ज़रा कहने से डरते हैं ,
मुहब्बत तोड़ती है दिल , सहमकर दिल बचाते हैं।

हुनर कुछ भी नहीं है बस ज़रा औज़ारबाज़ी है,
तुम्हारे ख्वाब के सोने से हम गहने बनाते हैं।।

यक़ीन है दोस्ती पर ,पर जरा दुनिया से डरते हैं
ये दुनिया दोस्तों की है , मेरे दुश्मन बताते हैं।

न फूलों के हसीं गुलशन ,ना बागीचे ,न दहकां हैं ,
पड़े बंजर में ‘ज़ाहिद’ मौज़ के कौवे उड़ाते हैं।।



27.07.10, 5810, 5.8.10