Tuesday, January 3, 2012

मत रख कंधों की आस।



एक झटके में नया साल आ गया। पिछले साल ने अभी अपनी अस्तव्यस्त दूकान उठाई भी नहीं कि अपनी दूकान लेकर नया साल आ गया...आओ स्वागत है साल 2012


सभी दोस्तों और अदीब साहबानों को नया साल मुबारक।  
 कुछ इस तरह




जिसकी आंखों में अपनापन अधरों सुखद सुहास।
दुनिया भर में सबसे ज्यादा दौलत उसके पास।

सिक्कों की खन खन में उसको नींद नहीं आती,
टकसालों के निकट बनाया जिसने भी आवासA

रोज़ जगाने चल पड़ता है भोर में बस्ती को,
इक दिन कट जायेगा मुर्ग़ा, उसे नहीं आभास।

खुश होता है लपट झपटकर, खीसें दिखलाता,
कूद फांद डाली डाली की बन्दर का अभ्यास।

भले मौसमी बादल से सूरज छिप जाता है,
लेकिन क्या मर जाता इससे पीला पड़ा प्रकाश?

खोल रहा है नया द्वार वह बंद कोठरी में,
हुनरमंद के हाथ हथौड़ा पकड़ाता संत्रास।

तू कपूर की काया कर ले, कस्तूरी का मन,
‘ज़ाहिद’ मुर्दा लोगों से मत रख कंधो की आस।


मंगलवार 3.1.12

Sunday, December 11, 2011

घायल सा इक ख़त




बहुत दिनों जब कुछ ना बोली सीली सी तनहाई।
दबे हुए कुछ सपने खोले उनको धूप दिखाई।।

कुछ खट्टे पल शिकवों की फफूंद खाए थे,
हाथ फेरकर उनका पोंछा फिर कुछ रगड़ लगाई।

कुछ सतरें अब भी आंसू की गंध लिए थीं,
मिटे हुए कुछ हर्फ़ो से यादें रिस आईं।

घायल सा इक ख़त जमीन पर फिसल जा गिरा,
तड़प रही थी उसमें, उसकी, सहमी सी रुसवाई।

टूटे हाथ लगाते जैसे गलत फैसले ,
उन वर्क़ों का क्या होना था ‘ज़ाहिद’ आग लगाई।

01.12.11,

Friday, November 25, 2011

कौली कौली धूप


सुबह जगाने आ जाती है, मुस्काती, मुंहबोली धूप।
कभी आलता, कभी अल्पना, लगती कभी रंगोली धूप।।

धुंधों कोहरों के सब कपड़े, जाने कहां उतारे हैं ,
चुंधिआई आंखों के आगे, नहा रही है भोली धूप।।

अंजुरी में भरकर शैफाली, कभी मोंगरे, कभी गुलाब,
कमरे में खुश्बू फैलाती है फूलों की डोली धूप।।

अगहन की अल्हड़ गोरी है, है पुआल यह पूसों की,
सावन भादों में करती है हम से आँख मिचोली धूप।।

आंगन आंगन जलते चूल्हे, आंगन आंगन पकते रूप,
आंगन आंगन करती फिरती, खुलकर हंसी ठिठौली धूप।।

उसका चेहरा बहुत दिनों से देख नहीं पाया हूं मैं,
आज हथेली पर रख ली है मैंने कौली कौली धूप।।

खेतों की है लुक्का छुप्पी, पेड़ों की है धूम धड़ाम,
‘ज़ाहिद’ से ही झीना झपटी करती धौली धौली धूप।।




कौली कौली - नर्म नर्म, (खासकर ताज़ा कोंपलों,  फूलों सब्जियों या वनस्पतियों के लिए)
धौली धौली - उजली, सफेद सफ्फाक,


19-11-11

Saturday, November 12, 2011

लानत है ऐसे इश्क को


जिनका भरोसा इश्क पर है  और जो साबुतदिल है , उनसे मुआफ़ी चाहता हूं. 
हालात का मारा समझ कर इसे पढ़ियेगा।

बस करबटें बेचैनियां और बेबसी रही ।।
लानत है ऐसे इश्क को जिसमें खुशी नहीं।

ज्यौं ज्यौं हुई वो दूर तो सुलगा तमाम जिस्म,
शीशे की आंखें देनी थी पर आतशी नहीं।

हंसता नहीं हूं बेसबब, बेवक़्त, हरजगह,
दिल का कोई हुनर मिरा फ़रमाइशी नहीं।

बढ़ती गई जो धूप तो मैं भी सिमट गया,
भड़की तपन से चाहता रस्काकसी नहीं।

गुलज़ार आरज़ी है ये, गुल तोड़ना मना ,
तफ़रीहगाह शहर है रिहायसी नहीं।

क़ुदरत मुमानिअत का मदरसा नहीं जनाब!
अग़यारियों हदबंदियों में ज़िदगी नहीं ।

लत है मुहब्बतों की मुझे बेहिसाब दें ,
‘ज़ाहिद’ तो शौकिया हूं मैं पैदाइशी नहीं।
31.10.11

Wednesday, September 21, 2011

मुक्तक / क़तआत

किसी के ख्याल से , पत्थर हुआ यह दिल पिघलता है।
नज़र के उठने गिरने से यहां मौसम बदलता है।
किसी की जुल्फ के साये में आकर ये समझ आया
लगी हो आग दिल में तो बदन सारा ही जलता है।
02.09.11

मुझे कुदरत की नेमत है, बड़े ईनाम लेता हूं।
बरसते हैं क़हर तो दौड़कर मैं थाम लेता हूं।
मुझे अफ़सोस है , सदमों से मैं बेहोश हो जाता ,
मगर जब होश आता है , तुम्हारा नाम लेता हूं।
02.09.11

फ़कीर होके न फाके़ किये ना मस्ती की।
किसी शहर में ना ठहरे न ठौरे बस्ती की।
न पैरहन ही संवारे न फ़िक्रेजुल्फ़ें की ,
तुम्हारी याद के सन्नाटों में गुमगस्ती की।
31.08.11

इस देश में आज़ादी पर पाबंदियां होने लगीं।
सागर ,धरा ,आकाश की हदबंदियां होने लगीं।
हद है कि होता सत्य का खुलकर यहां पै क़त्लेआम,
यह देखकर शहनाइंयां , सारंगियां रोने लगीं।
03.09.11

दिल हमारे साफ़ थे तो कैसे मैले हो गए
हम कभी पत्थर कभी मिट्टी के ढेले हो गए
जब अंधेरे थे तो सारे दोस्त-दुश्मन एक थे
अब उजालों में मिले तो सब अकेले हो गए।
16.09.11

Sunday, August 28, 2011

कुछ और मुक्तक



वृक्षारोपण

1.
बहुत है भीड़ फिर भी शहर क्यों सुनसान लगता है ?
कटे हैं पेड़ तो जंगल भी अब शमसान लगता हैं.
कहीं पुरखों का बूढ़ा पेड़ भी गिर जाए न इक दिन,
पिता के बाद से घर वैसे भी वीरान लगता है।

2.
तुम्हारी चाहतें अच्छी, सभी फरमाइशें अच्छी।
तुम्हारी चांद पर जा बसने की सब ख्वाहिशें अच्छी।
जो जंगल काटकर तुमने सितारा होटलें खोलीं,
तुम्हें तन्हाई में रोने की अब गुंजाइशें अच्छी ।

3.
जमूरे! आ , ज़रा आकर नया जादू तो दिखलाना।
कि साहब के छुपा है दिल में क्या सबको बता जाना।
निकलते आजकल है खानों के डिब्बों से टाइम बम,
किसी की जेब से इंसानियत निकले तो ले आना।


स्वतंत्रता दिवस

15.अग.2011
1. पतंग स्वतंत्रता की

टूटे दिलों के कांच से मंजा बना रहे।
फिर उससे बांधकर स्वतंत्रता उड़ा रहे।
कितनी मिली खुशी कि किसी की जो कट गई,
झटके हज़ार देके लो वो मुस्कुरा रहे।

2. अपनी अपनी रात

दीवारें शक़ की हम हिफ़ाजतन उठा रहे।
तालों पै ताले जड़के घरों को बचा रहे।
इक आधी रात वो कि वतन में जले चराग़,
इक आधी रात ये कि हम बत्ती बुझा रहे।


3. इन्साफ

ठहरी नदी में पानी कहां साफ़ मिलेगा ?
घड़ियालों को सौ खून यहां माफ़ मिलेगा,
सीने पै पड़े जख्मों के हिसाब न मांगों ,
जुर्माें के शहर में कहां इन्साफ़ मिलेगा।

4. जहां पानी ठहरता है

यहां आवारापन , बादल की जब पहचान होती है।
करूं क्या, सोच मेरी सुन के ये, हैरान होती है।
किसे देता नहीं पानी , बचा लो या बहा डालो
जहां पानी ठहरता है , वहां पर धान होती है।



Wednesday, June 1, 2011

दो मुक्तक

(दो मु-कताअत)

एक

मुझे लिखना नहीं आता , मुझे कोई लिखाता है।
मैं अंधा हूं , मुझे तो रास्ता कोई दिखाता है।
मुझे अब सूझता कुछ भी नहीं , न कुछ समझ आता ,
जो धक्का मारकर चलता , वही चलना सिखाता है।।
16.05.11
दो

किसी जंगल में जब भी हिरन का छौना निकलता है।
वहीं धरती में जैसे स्वर्ग का कोना निकलता है।
नहीं यह घास, गेहूं ,फूल ,फल या धान ही देती ,
कहीं हीरे निकलते हैं , कहीं सोना निकलता है।।
16.05.11