10.10.10. की शुभकामनाओं के साथ...
हक़ीम हो के जो दवा मांगे
गो कि तूफान भी हवा मांगे ।/1/
दिल मेरा चांद सितारे मांगे
मांग बेज़ा सही ,रवा मांगे ।/2/
रात की नीमजान खामोशी
गूंगे आकाश से सबा मांगे ।/3/
मेरी तन्हाइयों की परछाईं-
मेरी मायूसियां ,वबा मांगे ।/4/
चल किसी मोड़ पर चराग़ रखें
फ़िक्र में ख्वाहिशें कबा मांगे ।/5/
दुखती रग पर न कोई हाथ रखे
यक़ीन टूटे हैं ,ख़बा मांगे ।/6/
आज ‘ज़ाहिद’ से क्यों उमीदेवफ़ा
भूली बिसरी हुई नवा मांगे ? ।/7/
01.08.10
शब्दावली
बेज़ा = अपूरणीय , अनुचित ,
रवा = बजा , उचित , ठीक
सबा = सुबह की सुगंधित हवा, प्रातःसमीर ,
नीमजान = अर्द्धप्राण , अधमरी ,
वबा = महामारी ,क़यामत ,
कबा = चोगा , अंगरखा ,
ख़ौफ़ = भय , डर , अंदेशे
खबा = छुपाना ,गोपनीयता, एकांत
नवा = आवाज़, सदा ,
Sunday, October 10, 2010
Sunday, September 26, 2010
रंगोफ़नोसुख़न के भी जागीरदार हैं
होंगे गुनाहगार तो मर जाएंगे ज़ाहिद ।
वर्ना हज़ार बार सर उठाएंगे ज़ाहिद ।।
सौ बार या हज़ार या लाखों करोड़ बार
हों आजमाइशें तो न घबराएंगे ज़ाहिद ।।
लगती है जानलेवा कलेजे में हरेक चोट
गो जानती है सख़्त हैं बच जाएंगे ज़ाहिद।।
मकतब की ज़िन्दगी के लिए वर्क़ कै़द हैं
ना जाने कब मिलेंगे या मिलवाएंगे ज़ाहिद।।
गूंगी ग़ज़ल को बारहा कहते हैं मुक़र्रर
अशआर के शऊर बिखर जाएंगे ज़ाहिद।।
अब भी दुआ सलाम में शामिल है सियासत
क्या अब यहां से साफ़ निकल पाएंगे ज़ाहिद।।
रंगोफ़नोसुख़न के भी जागीरदार हैं
इस गांव में आने से भी कतराएंगे ज़ाहिद।।
28.04.10/17.05.10
आजमाइशें ः कठिन परीक्षाएं
मकतब ः किताबघर, शाला , वाचनालय ,
वर्क़ ः पन्ने ,
बारहा ः बार बार ,
मुक़र्रर ः पुनः , एक बार फिर ,
अशआर ः शेर का बहुवचन ,
शऊर ः शिष्टाचार , लिहाज ,
सियासत ः राजनीति , बनावट , झूठ
रंगोफ़नोसुख़न ः चित्ररंगशाला ,कला क्षेत्र ,साहित्य-सृजन
जागीरदार ः क्षेत्र विषेश का अधिपति , मालिक ,
वर्ना हज़ार बार सर उठाएंगे ज़ाहिद ।।
सौ बार या हज़ार या लाखों करोड़ बार
हों आजमाइशें तो न घबराएंगे ज़ाहिद ।।
लगती है जानलेवा कलेजे में हरेक चोट
गो जानती है सख़्त हैं बच जाएंगे ज़ाहिद।।
मकतब की ज़िन्दगी के लिए वर्क़ कै़द हैं
ना जाने कब मिलेंगे या मिलवाएंगे ज़ाहिद।।
गूंगी ग़ज़ल को बारहा कहते हैं मुक़र्रर
अशआर के शऊर बिखर जाएंगे ज़ाहिद।।
अब भी दुआ सलाम में शामिल है सियासत
क्या अब यहां से साफ़ निकल पाएंगे ज़ाहिद।।
रंगोफ़नोसुख़न के भी जागीरदार हैं
इस गांव में आने से भी कतराएंगे ज़ाहिद।।
28.04.10/17.05.10
आजमाइशें ः कठिन परीक्षाएं
मकतब ः किताबघर, शाला , वाचनालय ,
वर्क़ ः पन्ने ,
बारहा ः बार बार ,
मुक़र्रर ः पुनः , एक बार फिर ,
अशआर ः शेर का बहुवचन ,
शऊर ः शिष्टाचार , लिहाज ,
सियासत ः राजनीति , बनावट , झूठ
रंगोफ़नोसुख़न ः चित्ररंगशाला ,कला क्षेत्र ,साहित्य-सृजन
जागीरदार ः क्षेत्र विषेश का अधिपति , मालिक ,
Saturday, August 28, 2010
हुनर कुछ भी नहीं है बस ज़रा औज़ारबाज़ी है,
परिन्दे हौसलों के आसमां को नाप आते हैं।
जहां तूफ़ान ने तोड़ा वहीं पर घर बनाते हैं।।
गो गिद्धों से भरी है खौफ़ की बेदर्द ये दुनिया,
हंसी होंठों पै लेकर हम जहां को मुंह चिढ़ाते हैं।।
उन्हें हर बात पर दुनिया के मर मिटने की हसरत है,
नज़र जब इश्क़ की पड़ती है तो नज़रें चुराते हैं।।
मुझे वो चाहते हैं बस ज़रा कहने से डरते हैं ,
मुहब्बत तोड़ती है दिल , सहमकर दिल बचाते हैं।
हुनर कुछ भी नहीं है बस ज़रा औज़ारबाज़ी है,
तुम्हारे ख्वाब के सोने से हम गहने बनाते हैं।।
यक़ीन है दोस्ती पर ,पर जरा दुनिया से डरते हैं
ये दुनिया दोस्तों की है , मेरे दुश्मन बताते हैं।
न फूलों के हसीं गुलशन ,ना बागीचे ,न दहकां हैं ,
पड़े बंजर में ‘ज़ाहिद’ मौज़ के कौवे उड़ाते हैं।।
27.07.10, 5810, 5.8.10
जहां तूफ़ान ने तोड़ा वहीं पर घर बनाते हैं।।
गो गिद्धों से भरी है खौफ़ की बेदर्द ये दुनिया,
हंसी होंठों पै लेकर हम जहां को मुंह चिढ़ाते हैं।।
उन्हें हर बात पर दुनिया के मर मिटने की हसरत है,
नज़र जब इश्क़ की पड़ती है तो नज़रें चुराते हैं।।
मुझे वो चाहते हैं बस ज़रा कहने से डरते हैं ,
मुहब्बत तोड़ती है दिल , सहमकर दिल बचाते हैं।
हुनर कुछ भी नहीं है बस ज़रा औज़ारबाज़ी है,
तुम्हारे ख्वाब के सोने से हम गहने बनाते हैं।।
यक़ीन है दोस्ती पर ,पर जरा दुनिया से डरते हैं
ये दुनिया दोस्तों की है , मेरे दुश्मन बताते हैं।
न फूलों के हसीं गुलशन ,ना बागीचे ,न दहकां हैं ,
पड़े बंजर में ‘ज़ाहिद’ मौज़ के कौवे उड़ाते हैं।।
27.07.10, 5810, 5.8.10
Friday, July 23, 2010
दो ग़ज़ल
बारिश की बारदात।
कुछ भी नया नहीं है, वहीं दिन है, वही रात !
उनसे कहूं तो कैसे कहूं कोई नयी बात !!
पूनम की रात , चांद के माथे पै अंधेरा ,
मुझको लगा अदा से हुई जुल्फों की बरसात ।
बादल की चादरों से झांकती है चांदनी ,
शायद ग़ज़ल है आसमां की गोद में नवजात!
सौ मील की रफ़्तार थी तूफ़ानेजोश में ,
घर को उजाड़कर गई , बारिश की बारदात।
‘ज़ाहिद’ लगे उम्मीद रुदाली है आजकल ,
खुशियों में अश्क बनके टपक पड़ते हैं जज्बात ।
27.6.10
मैं तो दरिया हूं नये ख्वाब का ,बहने आया ।।
‘क्यों है खाली तेरा घर’, कोई ना कहने आया ।
तू गया छोड़ के तो कोई ना रहने आया ।।
मैं कभी इश्क़ की फ़रमाइशें नहीं करता,
मैं तो दरिया हूं नये ख्वाब का , बहने आया ।।
‘हां’ के आईने में परदे हैं सौ बहानों के ,
कोई भी लफ़्ज़ कहां सादगी पहने आया ।?
गुम हुई हंसती खिलखिलाती हुई ताजा़ हवा ,
वक़्त सब शौक के उतारकर गहने आया ।।
मेरे आंसू या पसीने को न पोंछो ‘ज़ाहिद’,
जो भी हिस्से में मिरे आए मैं सहने आया ।।
30.6.10
इसरार: इस बार दो ग़ज़ल एक साथ पढ़ने की तकलीफ़ आपको होगी। पर क्या करूं दोनों का एक साथ देना मेरी मज़बूरी है।
पहली ग़ज़ल तब बनी जब इस तरफ़ तबाही मचाता हुआ तूफान आया और बारिश भी। जानोमाल के नुकसान जो हुए सो हुए ही , तीन दिन तक बिजली भी न आ सकी। एक दिन की बारिश से इतनी ठंडक भी नहीं पड़ी थी कि ऊमस न रहे। इसी बीच मेरे अपने को वापस लौटना भी था । दूसरी ग़ज़ल तब अपने आप हो गई। मुलाहिज़ा फरमाएं और इसला करें।
कुछ भी नया नहीं है, वहीं दिन है, वही रात !
उनसे कहूं तो कैसे कहूं कोई नयी बात !!
पूनम की रात , चांद के माथे पै अंधेरा ,
मुझको लगा अदा से हुई जुल्फों की बरसात ।
बादल की चादरों से झांकती है चांदनी ,
शायद ग़ज़ल है आसमां की गोद में नवजात!
सौ मील की रफ़्तार थी तूफ़ानेजोश में ,
घर को उजाड़कर गई , बारिश की बारदात।
‘ज़ाहिद’ लगे उम्मीद रुदाली है आजकल ,
खुशियों में अश्क बनके टपक पड़ते हैं जज्बात ।
27.6.10
मैं तो दरिया हूं नये ख्वाब का ,बहने आया ।।
‘क्यों है खाली तेरा घर’, कोई ना कहने आया ।
तू गया छोड़ के तो कोई ना रहने आया ।।
मैं कभी इश्क़ की फ़रमाइशें नहीं करता,
मैं तो दरिया हूं नये ख्वाब का , बहने आया ।।
‘हां’ के आईने में परदे हैं सौ बहानों के ,
कोई भी लफ़्ज़ कहां सादगी पहने आया ।?
गुम हुई हंसती खिलखिलाती हुई ताजा़ हवा ,
वक़्त सब शौक के उतारकर गहने आया ।।
मेरे आंसू या पसीने को न पोंछो ‘ज़ाहिद’,
जो भी हिस्से में मिरे आए मैं सहने आया ।।
30.6.10
इसरार: इस बार दो ग़ज़ल एक साथ पढ़ने की तकलीफ़ आपको होगी। पर क्या करूं दोनों का एक साथ देना मेरी मज़बूरी है।
पहली ग़ज़ल तब बनी जब इस तरफ़ तबाही मचाता हुआ तूफान आया और बारिश भी। जानोमाल के नुकसान जो हुए सो हुए ही , तीन दिन तक बिजली भी न आ सकी। एक दिन की बारिश से इतनी ठंडक भी नहीं पड़ी थी कि ऊमस न रहे। इसी बीच मेरे अपने को वापस लौटना भी था । दूसरी ग़ज़ल तब अपने आप हो गई। मुलाहिज़ा फरमाएं और इसला करें।
Thursday, July 1, 2010
काग़ज़ों में शोर है फ़िरदौस का
दोस्तों! भयानक तपती गर्मी का यह गर्म अहसास अगर मुमकिन हो तो बारिश की फुहारों के साथ पढ़ें...
फ़िल्म से यह मेल क्यों खाती नहीं ?
ज़िन्दगी रोती हुई गाती नहीं।
आग के आते थपेड़े हैं सदा
पंखों से ठंडी हवा आती नहीं।
रेंगती है जौंक-सी मरियल नदी
अब किसी अल्हड़ सी बलखाती नहीं।
काग़ज़ों में शोर है फ़िरदौस का
बुर्क़े हैं , सूरत नज़र आती नहीं।
कहते हैं कि उस तरफ़ हैं मंजिलें,
जिस तरफ़ कोई सड़क जाती नहीं।
जख़्म ताक़तभर दबाती है सफ़ा
दुखती रग आहिस्ता सहलाती नहीं।
बेसबब ‘ज़ाहिद’ खड़े हो राह में
अब सबा कलसे इधर लाती नहीं।
16.05.10 फ़िरदौस-स्वर्ग/ सफ़ा- इलाज़/सबा- सुबह की ठंडी हवा
फ़िल्म से यह मेल क्यों खाती नहीं ?
ज़िन्दगी रोती हुई गाती नहीं।
आग के आते थपेड़े हैं सदा
पंखों से ठंडी हवा आती नहीं।
रेंगती है जौंक-सी मरियल नदी
अब किसी अल्हड़ सी बलखाती नहीं।
काग़ज़ों में शोर है फ़िरदौस का
बुर्क़े हैं , सूरत नज़र आती नहीं।
कहते हैं कि उस तरफ़ हैं मंजिलें,
जिस तरफ़ कोई सड़क जाती नहीं।
जख़्म ताक़तभर दबाती है सफ़ा
दुखती रग आहिस्ता सहलाती नहीं।
बेसबब ‘ज़ाहिद’ खड़े हो राह में
अब सबा कलसे इधर लाती नहीं।
16.05.10 फ़िरदौस-स्वर्ग/ सफ़ा- इलाज़/सबा- सुबह की ठंडी हवा
Saturday, June 5, 2010
इस नदी की सादगी मत देखिए
कामयाबी सिफ़्र भी , चहार भी।
ज़िन्दगी में जीत भी है , हार भी।।
सैकड़ों फिसले ,गिरे हज़ार भी,
रास्ते दुश्वार भी , हमबार भी।।
मत किसी मुरझाए पौधे को उखाड़
आएगी उस पर कभी बहार भी।।
उम्र जंगल से गुज़रती भेड़ है,
ताक में हैं शेर भी , सियार भी।।
हौसले हांकें ही हैं , हांफे हुए,
जान सहमी भी है , पर , तैयार भी
इस नदी की सादगी मत देखिए
इसमें हैं चढ़ाव भी , उतार भी।।
मुफ़लिसी ‘ज़ाहिद’ अमीरी का ही नाम
क़ैदख़ाने भी है , गर , हिसार भी।।
300510
सिफ़्र-शून्य ; चहार -चार ,चार गुनी ;
चौगुनी ;
दुश्वार- कठिन , मुश्किल ,दुर्गम ;
हमबार -समतल , सुगम ;
हांकें -जानवरों को पकड़ने के लिए आदमियों का शोर ;
हिसार - क़िला ,दुर्ग ;
ज़िन्दगी में जीत भी है , हार भी।।
सैकड़ों फिसले ,गिरे हज़ार भी,
रास्ते दुश्वार भी , हमबार भी।।
मत किसी मुरझाए पौधे को उखाड़
आएगी उस पर कभी बहार भी।।
उम्र जंगल से गुज़रती भेड़ है,
ताक में हैं शेर भी , सियार भी।।
हौसले हांकें ही हैं , हांफे हुए,
जान सहमी भी है , पर , तैयार भी
इस नदी की सादगी मत देखिए
इसमें हैं चढ़ाव भी , उतार भी।।
मुफ़लिसी ‘ज़ाहिद’ अमीरी का ही नाम
क़ैदख़ाने भी है , गर , हिसार भी।।
300510
सिफ़्र-शून्य ; चहार -चार ,चार गुनी ;
चौगुनी ;
दुश्वार- कठिन , मुश्किल ,दुर्गम ;
हमबार -समतल , सुगम ;
हांकें -जानवरों को पकड़ने के लिए आदमियों का शोर ;
हिसार - क़िला ,दुर्ग ;
Monday, May 24, 2010
ज़िन्दगी के भवन में चढ़ते हुए
कैसे कैसे दौर से गुज़रा हूं मैं
भरतनाट्यम्, कुचिपुड़ी, मुजरा हूं मैं।
ज़िन्दगी के भवन में चढ़ते हुए
मौत की सौ सीढ़ियां उतरा हूं मैं।
थी मिली सूरत भली , सीरत भली
गदिर्शों के दांत का कुतरा हूं मैं।
कुछ गली गंदी मिलीं, कुछ पाक साफ़
पैरहन मत देखिए सुतरा हूं मैं।
पल फले , फसलें पकीं ,‘ज़ाहिद’ मगर
खेत में झूठा खड़ा पुतरा हूं मैं।
दि. 08.04.10
सुतरा - पवित्र , स्वच्छ ,
पुतरा - पुतला , बिजूका ,
भरतनाट्यम्, कुचिपुड़ी, मुजरा हूं मैं।
ज़िन्दगी के भवन में चढ़ते हुए
मौत की सौ सीढ़ियां उतरा हूं मैं।
थी मिली सूरत भली , सीरत भली
गदिर्शों के दांत का कुतरा हूं मैं।
कुछ गली गंदी मिलीं, कुछ पाक साफ़
पैरहन मत देखिए सुतरा हूं मैं।
पल फले , फसलें पकीं ,‘ज़ाहिद’ मगर
खेत में झूठा खड़ा पुतरा हूं मैं।
दि. 08.04.10
सुतरा - पवित्र , स्वच्छ ,
पुतरा - पुतला , बिजूका ,
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