Monday, August 25, 2014

दो ग़ज़लें



1
अहसास की हवा

सदमे में घिर गया है बसर बोलता नहीं।
पाकर परिन्दा जैसे कि पर तौलता नहीं।

मुट्ठी में तो यादें लिए है रंग-रंग की,
जज्बात के पानी में मगर घोलता नहीं।

यूं जज्ब है जफ़्तोशऊरेहोश में गुरूर,
अहसास की हवा में शज़र डोलता नहीं।

पत्थर हुईं हैं संग-तराशों की धड़कनें,
सुनते हुए दिल दस्तकें दर खोलता नहीं।

‘ज़ाहिद’ तली में जल गए दुनिया के हौसले,
रग-रग में जमा ख़ूनेजिगर खौलता नहीं।

               24-25.08.14,

जज्ब - लय, घुले हुए, सोखे हुए,
जफ़्तोशऊरेहोश - चेतनता के संयम और संयमित व्यवहार,
शजर - पेड़,
संगतराश - पत्थर का शिल्पी,


2
दहशतज़दा हैं बाग के गुल

होने लगी है रात घनी जागते रहो।
सरहद में फिर है जंग ठनी जागते रहो।

जिनको नहीं है फिक्र ही अम्नोअवाम की
उनसे किसी की कब है बनी जागते रहो।

सुनते रहे हैं, आज मगर देख रहे हैं,
ज़र के लिए तलवार तनी जागते रहो।

नाहक़ है हक़ बदनाम, हैं नापाक इरादे,
ईमान का है कौन धनी? जागते रहो।

दहशतज़दा हैं बाग के गुल बागवान से,
हर सांस है शुबहे में सनी जागते रहो।

      25.08.14


अम्नोअवाम - शांति और प्रजाजन,
नाहक - व्यर्थ, बेकार, बिना वजह,
हक - अधिकार,
ईमान - सत्य, आंतरिक सत्य,
दहशतज़दा - भयभीत, दहशत में डूबा,
शुब्हे - अंदेशा, संदेह,



Wednesday, January 1, 2014

अच्छा लगता है।




लाख विदेशी ठौर ठिकाना, अच्छा लगता है।
पर चेहरा जाना पहजाना, अच्छा लगता है।।

रूठे हुए रुखों पर देखा छुपा हुआ गीलापन,
तभी रुलाकर उन्हें मनाना, अच्छा लगता है।।

महफिल में जब झूठे सच्चे क़िस्से उछल रहे हों,
किसी ख़ास का नाम छुपाना अच्छा लगता है।।

झूठ मूठ जब कोई बोले-‘हम सब समझ रहे हैं-’
ऐसे तुक्कों पर मुस्काना, अच्छा लगता है।।

धूप में सपनों के जब गीले कपड़े सूख रहे हों,
तन्हां छत पर उनका आना, अच्छा लगता है।।

गांव से जिसने क़स्बा जोड़ा, पहुंच शहर तक पाई,
उसी सड़क का मोड़ पुराना, अच्छा लगता है।।

छुपा-छुपी की मीठी खुश्बू अब तक ताज़ादम है,
यादों के बचपन में जाना, अच्छा लगता है।।

बजती हुई तालियों में भी अनुभव बोल रहे हैं,
तभी ताल पर कजरी गाना, अच्छा लगता है।।

बंद हथेली में ‘ज़ाहिद’ की, सदियां छुपी हुई हैं,
आज अकेला यही ख़ज़ाना अच्छा लगता है।।

                          बुधवार, 01.01.2014






Saturday, November 9, 2013

रूह की ग़ज़ल


रूह की ग़ज़ल

आजकल बदला हुआ ख़ामोश शहर है।
फूलों की खुशबुओं में भी बारूदी जहर है।

जो दे रहे अवाम को जन्नत के दिलासे,
रंजिश, अदावतों से भरी उनकी नज़र है।

हमने तो अमनोचैन की रोपी थी क्यारियां,
कैसे यहां ऊगे हुए ये जुल्मोकहर हैं।

खेतों के वास्ते पसीने हमने बहाए,
पर क्यों यहां आंसू भरी हर एक लहर है।

जख्मों को सदा हंस के मरहम हौसलों की दी,
ना जाने कैसे रह गए पर उनके असर हैं।

जिस्मों के जतन से संभाले काफ़ि़ए,रदीफ़,
पर रूह की ग़ज़ल में बहक जाती बहर है।

‘ज़ाहिद’ की मुट्ठियों में फ़क़त रेत रह गई,
जाने कहां समा गई अमृत की नहर है।

              09.11.13





Thursday, February 28, 2013

कोई हिम्मत से आए जाए तो।




देर से आए मगर आए तो।
नाज़ से वो गले लगाए तो।

मेरी तबियत भी है फरेबफहम1,
ख़्वाब कोई ज़रा सजाए तो।

हम कहां होशमंद2 रहते हैं,
उनको कोई खबर सुनाए तो।

किसका दर है ये दारीचा3 किसका,
हम कहां हैं कोई बताए तो।

कौन कहता है हम नहीं बदले,
अब कोई आइना दिखाए तो।

ये गली अब भी आशना4 है हुजूर!
कोई हिम्मत से आए जाए तो।

यूं कि अब भी वहीं पै हैं ‘ज़ाहिद’
आके कोई कभी उठाए तो।
09.02.13

1. धोके में जीने वाला, कल्पनाजीवी, 2. होश में, चैतन्य, 3. गलियां, राहदारी, 4. स्नेहिल, चाहनेवाली,


Saturday, September 29, 2012

ख़्वाबों के कसीदे




कहने के लिए यों तो हज़ारों में कहा है।
जो कह नहीं सका, वो इशारों में कहा है।।

मझधार में तूफ़ान से लड़ते रहे चुपचाप,
फिर जीत के हुनर को किनारों में कहा है।।

पतझर के दर्द, गर्मियों की प्यासी तपन को,
फूलों की रंगोबू से बहारों में कहा है।।

सांसों की डोर डोर से ख़्वाबों के कसीदे,
नज़मों में उकेरे हैं, नज़ारों में कहा है।।

सदमात सर्द कर गए दिल, फिर भी ख़्वाहिशें-
सरगोशियों में सुर्ख़ अज़ारों में कहा है।।

इस मुल्क में चूल्हों पै जो गुज़री है सुब्होशाम,
ईंधन की दुकानों से क़तारों में कहा है।।

सूरज को दिन दहाड़े तो पूनम में चांद को,
‘ज़ाहिद’ ग्रहन लगे तो सितारों में कहा है।।
29.09.12, शनिवार


शब्दावली:

1. जीत के हुनर = विजय के  कौशल , जीतने के गुर,
2. रंगोबू = रंग और सुगंध, 3. ख्वाबों के कसीदे = सपनों के बेलबूटे,
4. नज़मों = कविताओं, 5. सदमात = सदमा का बहुवचन, चोटें, प्रक्षेप,
6. सर्द = सफ़ेद, रक्तहीन, विवर्ण, 7. ख्वाहिशें = इच्छाएं,
8. सरगोशियों = फुसफुसाहटों, कान में कही जानेवाली बातें,
9. सुर्ख़ = लाल, आरक्त,  10. अज़ारों = गालों,

Saturday, May 19, 2012

इरादे नेक हैं,


महफ़िल में इस ख़्याल से फिर आ गया हूं मैं,
निस्बत, जुनून, शौक़ भी आए हैं बज़्म में ।।

दोस्तों आदाब!! 


हादसा अर्शोज़मीन पर कोई हुआ सा है।
आज चेहरा ए माहताब कुछ बुझा सा है।।

सामने आते ही मुंह फेर वो लेता है क्यों ?  
मेरे बारे में उसका ख़्याल कुछ जुदा सा है।।

बोझ अनजाने हैं, सौ किस्म, सौ तरीक़े के,
है सफ़र लंबा बहुत और सर झुका सा है।।

अब्र की तरह सा आ आ के किधर जाता है,
अश्क़ की शक्ल में, कुछ तो है जो छुपा सा है।।

खुद सुराही है वो, प्याला भी है, शराब भी है,
इरादे नेक हैं, मौसम ही कुछ बुरा सा है।।

सिर्फ़ तलवार पर चलती तो खै़र थी लेकिन,
जीस्त के इस तरफ़ खाई, उधर कुआं सा है।।

बहुत दिनों से फ़जा़ओं में थी तपन ‘ज़ाहिद’,
सबा ए दस्तेहिना ने मुझे छुआ सा है।।

18.03.12, रविवार,

Tuesday, January 3, 2012

मत रख कंधों की आस।



एक झटके में नया साल आ गया। पिछले साल ने अभी अपनी अस्तव्यस्त दूकान उठाई भी नहीं कि अपनी दूकान लेकर नया साल आ गया...आओ स्वागत है साल 2012


सभी दोस्तों और अदीब साहबानों को नया साल मुबारक।  
 कुछ इस तरह




जिसकी आंखों में अपनापन अधरों सुखद सुहास।
दुनिया भर में सबसे ज्यादा दौलत उसके पास।

सिक्कों की खन खन में उसको नींद नहीं आती,
टकसालों के निकट बनाया जिसने भी आवासA

रोज़ जगाने चल पड़ता है भोर में बस्ती को,
इक दिन कट जायेगा मुर्ग़ा, उसे नहीं आभास।

खुश होता है लपट झपटकर, खीसें दिखलाता,
कूद फांद डाली डाली की बन्दर का अभ्यास।

भले मौसमी बादल से सूरज छिप जाता है,
लेकिन क्या मर जाता इससे पीला पड़ा प्रकाश?

खोल रहा है नया द्वार वह बंद कोठरी में,
हुनरमंद के हाथ हथौड़ा पकड़ाता संत्रास।

तू कपूर की काया कर ले, कस्तूरी का मन,
‘ज़ाहिद’ मुर्दा लोगों से मत रख कंधो की आस।


मंगलवार 3.1.12

Sunday, December 11, 2011

घायल सा इक ख़त




बहुत दिनों जब कुछ ना बोली सीली सी तनहाई।
दबे हुए कुछ सपने खोले उनको धूप दिखाई।।

कुछ खट्टे पल शिकवों की फफूंद खाए थे,
हाथ फेरकर उनका पोंछा फिर कुछ रगड़ लगाई।

कुछ सतरें अब भी आंसू की गंध लिए थीं,
मिटे हुए कुछ हर्फ़ो से यादें रिस आईं।

घायल सा इक ख़त जमीन पर फिसल जा गिरा,
तड़प रही थी उसमें, उसकी, सहमी सी रुसवाई।

टूटे हाथ लगाते जैसे गलत फैसले ,
उन वर्क़ों का क्या होना था ‘ज़ाहिद’ आग लगाई।

01.12.11,

Friday, November 25, 2011

कौली कौली धूप


सुबह जगाने आ जाती है, मुस्काती, मुंहबोली धूप।
कभी आलता, कभी अल्पना, लगती कभी रंगोली धूप।।

धुंधों कोहरों के सब कपड़े, जाने कहां उतारे हैं ,
चुंधिआई आंखों के आगे, नहा रही है भोली धूप।।

अंजुरी में भरकर शैफाली, कभी मोंगरे, कभी गुलाब,
कमरे में खुश्बू फैलाती है फूलों की डोली धूप।।

अगहन की अल्हड़ गोरी है, है पुआल यह पूसों की,
सावन भादों में करती है हम से आँख मिचोली धूप।।

आंगन आंगन जलते चूल्हे, आंगन आंगन पकते रूप,
आंगन आंगन करती फिरती, खुलकर हंसी ठिठौली धूप।।

उसका चेहरा बहुत दिनों से देख नहीं पाया हूं मैं,
आज हथेली पर रख ली है मैंने कौली कौली धूप।।

खेतों की है लुक्का छुप्पी, पेड़ों की है धूम धड़ाम,
‘ज़ाहिद’ से ही झीना झपटी करती धौली धौली धूप।।




कौली कौली - नर्म नर्म, (खासकर ताज़ा कोंपलों,  फूलों सब्जियों या वनस्पतियों के लिए)
धौली धौली - उजली, सफेद सफ्फाक,


19-11-11

Saturday, November 12, 2011

लानत है ऐसे इश्क को


जिनका भरोसा इश्क पर है  और जो साबुतदिल है , उनसे मुआफ़ी चाहता हूं. 
हालात का मारा समझ कर इसे पढ़ियेगा।

बस करबटें बेचैनियां और बेबसी रही ।।
लानत है ऐसे इश्क को जिसमें खुशी नहीं।

ज्यौं ज्यौं हुई वो दूर तो सुलगा तमाम जिस्म,
शीशे की आंखें देनी थी पर आतशी नहीं।

हंसता नहीं हूं बेसबब, बेवक़्त, हरजगह,
दिल का कोई हुनर मिरा फ़रमाइशी नहीं।

बढ़ती गई जो धूप तो मैं भी सिमट गया,
भड़की तपन से चाहता रस्काकसी नहीं।

गुलज़ार आरज़ी है ये, गुल तोड़ना मना ,
तफ़रीहगाह शहर है रिहायसी नहीं।

क़ुदरत मुमानिअत का मदरसा नहीं जनाब!
अग़यारियों हदबंदियों में ज़िदगी नहीं ।

लत है मुहब्बतों की मुझे बेहिसाब दें ,
‘ज़ाहिद’ तो शौकिया हूं मैं पैदाइशी नहीं।
31.10.11

Wednesday, September 21, 2011

मुक्तक / क़तआत

किसी के ख्याल से , पत्थर हुआ यह दिल पिघलता है।
नज़र के उठने गिरने से यहां मौसम बदलता है।
किसी की जुल्फ के साये में आकर ये समझ आया
लगी हो आग दिल में तो बदन सारा ही जलता है।
02.09.11

मुझे कुदरत की नेमत है, बड़े ईनाम लेता हूं।
बरसते हैं क़हर तो दौड़कर मैं थाम लेता हूं।
मुझे अफ़सोस है , सदमों से मैं बेहोश हो जाता ,
मगर जब होश आता है , तुम्हारा नाम लेता हूं।
02.09.11

फ़कीर होके न फाके़ किये ना मस्ती की।
किसी शहर में ना ठहरे न ठौरे बस्ती की।
न पैरहन ही संवारे न फ़िक्रेजुल्फ़ें की ,
तुम्हारी याद के सन्नाटों में गुमगस्ती की।
31.08.11

इस देश में आज़ादी पर पाबंदियां होने लगीं।
सागर ,धरा ,आकाश की हदबंदियां होने लगीं।
हद है कि होता सत्य का खुलकर यहां पै क़त्लेआम,
यह देखकर शहनाइंयां , सारंगियां रोने लगीं।
03.09.11

दिल हमारे साफ़ थे तो कैसे मैले हो गए
हम कभी पत्थर कभी मिट्टी के ढेले हो गए
जब अंधेरे थे तो सारे दोस्त-दुश्मन एक थे
अब उजालों में मिले तो सब अकेले हो गए।
16.09.11

Sunday, August 28, 2011

कुछ और मुक्तक



वृक्षारोपण

1.
बहुत है भीड़ फिर भी शहर क्यों सुनसान लगता है ?
कटे हैं पेड़ तो जंगल भी अब शमसान लगता हैं.
कहीं पुरखों का बूढ़ा पेड़ भी गिर जाए न इक दिन,
पिता के बाद से घर वैसे भी वीरान लगता है।

2.
तुम्हारी चाहतें अच्छी, सभी फरमाइशें अच्छी।
तुम्हारी चांद पर जा बसने की सब ख्वाहिशें अच्छी।
जो जंगल काटकर तुमने सितारा होटलें खोलीं,
तुम्हें तन्हाई में रोने की अब गुंजाइशें अच्छी ।

3.
जमूरे! आ , ज़रा आकर नया जादू तो दिखलाना।
कि साहब के छुपा है दिल में क्या सबको बता जाना।
निकलते आजकल है खानों के डिब्बों से टाइम बम,
किसी की जेब से इंसानियत निकले तो ले आना।


स्वतंत्रता दिवस

15.अग.2011
1. पतंग स्वतंत्रता की

टूटे दिलों के कांच से मंजा बना रहे।
फिर उससे बांधकर स्वतंत्रता उड़ा रहे।
कितनी मिली खुशी कि किसी की जो कट गई,
झटके हज़ार देके लो वो मुस्कुरा रहे।

2. अपनी अपनी रात

दीवारें शक़ की हम हिफ़ाजतन उठा रहे।
तालों पै ताले जड़के घरों को बचा रहे।
इक आधी रात वो कि वतन में जले चराग़,
इक आधी रात ये कि हम बत्ती बुझा रहे।


3. इन्साफ

ठहरी नदी में पानी कहां साफ़ मिलेगा ?
घड़ियालों को सौ खून यहां माफ़ मिलेगा,
सीने पै पड़े जख्मों के हिसाब न मांगों ,
जुर्माें के शहर में कहां इन्साफ़ मिलेगा।

4. जहां पानी ठहरता है

यहां आवारापन , बादल की जब पहचान होती है।
करूं क्या, सोच मेरी सुन के ये, हैरान होती है।
किसे देता नहीं पानी , बचा लो या बहा डालो
जहां पानी ठहरता है , वहां पर धान होती है।



Wednesday, June 1, 2011

दो मुक्तक

(दो मु-कताअत)

एक

मुझे लिखना नहीं आता , मुझे कोई लिखाता है।
मैं अंधा हूं , मुझे तो रास्ता कोई दिखाता है।
मुझे अब सूझता कुछ भी नहीं , न कुछ समझ आता ,
जो धक्का मारकर चलता , वही चलना सिखाता है।।
16.05.11
दो

किसी जंगल में जब भी हिरन का छौना निकलता है।
वहीं धरती में जैसे स्वर्ग का कोना निकलता है।
नहीं यह घास, गेहूं ,फूल ,फल या धान ही देती ,
कहीं हीरे निकलते हैं , कहीं सोना निकलता है।।
16.05.11

Sunday, May 22, 2011

बहुत उर्वर धरा है

हसीं है ज़िन्दगी , उसके लिए रोना भी पड़ता है।
उसी की मर्ज़ी जो चाहे , हमें होना ही पड़ता है।।

जिसे हम चाहें , अपना हो भी जाए ये नहीं सब कुछ ,
अगर कुछ पाना होता है तो कुछ खोना भी पड़ता है।।

बहुत उर्वर धरा है कुछ ना कुछ ऊगा ही करता है ,
मगर कुछ खास लेना हो तो फिर बोना ही पड़ता है।।

करे कोई , भरे कोई , ये क़िस्सा भी पुराना है ,
लगाता दाग़ दिल है , आंख को धोना ही पड़ता है।।

वो सारी रात मेरी बात पर हंसती रही लेकिन ,
सुबह बोली कि पगले रात में सोना भी पड़ता है।।
16.05.11

Sunday, May 8, 2011

मदर्स डे पर

आपकी बस्ती में घर मेरा न गुमनाम रहे।
कोई रिश्ता न सही पर दुआ सलाम रहे।।

शफ़क़ के तौर तरीक़ों के न रहें का़यल
हमारी निस्बतों में चांद सुब्ह ओ शाम रहे।।

इसी तरह से रहेगा जहां में जोश ओ जुनूं
हुनर किसी का रहे , आपका ईनाम रहे ।।

नज़र में चंद चुनिन्दा न साहबान रहें ,
मुसीबतों में फ़िक्र बस्ती ए तमाम रहे।।

ये क्या कि बैठा रहे कोठरी में रखवाला ,
घरों में लूट रहे, जुल्म ओ कोहराम रहे।।

यही दुआ है जहां यह रहे , रहे न रहे ,
खूबसूरत मगर आगाज़ ओ अन्जाम रहे।।

गर्ज़ ओ वहशत से भरी जिनदगी के जंगल में,
मां की ममता का सर पे साया सरेआम रहे।

Monday, April 4, 2011

डॉ.आर रामकुमार जी : नई हिन्दी ग़ज़ल

डॉ.आर रामकुमार जी ने रंग पंचमी में अपने विशेष अंदाज में गाकर इस रचना को कालजयी कर दिया। मित्रों ने रंग पंचमी के कविसम्मेलन के दूसरे दिन बताया कि सुबह चार बजे के बाद भी उनके गले में यही रचना अटकी रही और दिमाग में कई और दिनों तक इसका असर बरकारार रहा ..बल्कि आज भी है। आपके लिए इस बार ...

संतुलन, संतुलन, संतुलन, संतुलन !!
ज़िन्दगी भर कदम दर कदम संतुलन।।

प्रेम की संकरी गलियों में तिरछे चलो,
द्वेष आगे खड़ा , पीठ पीछे जलन ।।

खिलखिलाना बड़ी साध की बात है,
खीझना-चीखना कुण्ठितों का चलन।।

नव-सृजन की करे जो भी आलोचना,
समझो आहत हुआ उसका चिर-बांझपन।।

रोशनी, धूप, पानी, हवा, आग को,
कै़द कर न सके , नाम उसका कुढ़न।।

हर सदी चाहती है नई हो लहर ,
ताकि क़ायम फ़िज़ा का रहे बांकपन।।

जब घृणा फेंके पत्थर तो झुक जाइये,
अपने संयम का करते रहें आंकलन।।

आत्मविश्वास रखता है, दोनों जगह ,
भीड़ में संतुलन , भाड़ में संतुलन।।

आग यूं तापिये कि न दामन जले,
आंच में संतुलन , सांच में संतुलन ।।

खाओ ऐसा कि पीना मज़ा दे सके ,
खान में संतुलन , पान में संतुलन ।।

बस्ती सोई रही तो लुटीं ज़िदगी ,
नींद में संतुलन , जाग में संतुलन ।।

रंग ही रंग हो कोई कीचड़ न हो,
बाग में संतुलन ,फाग में संतुलन ।।

Monday, February 21, 2011

अब तो हर ख़्याल ख़ुशगवार बने।

1.

ईद में दीद के आसार बनें ।
अरमां क्यों आज सोगवार बनें।

मेरी ख़ामोशियों को नाम न दो ,
इश्क़ है इश्क़ न अख़बार बने।

जो बहुत बोलते हैं उनको न सुन
तू न नफ़रत का कारोबार बने।

है फ़ज़ा में बहार का आलम ,
अब तो हर ख़्याल ख़ुशगवार बने।

वक्त ‘ज़ाहिद’ का निगहबान रहे ,
रूह हर्गिज़ न शर्मशार बने।



16.02.11

2.

मज़बूर हैं हम किन्तु गुनहगार नहीं है।
सरकार के किरदार में सरकार नहीं हैं।

हां है करोड़ों धन छुपा बाहर विदेश में
पर देख लो स्वदेश में घर द्वार नहीं है।

ऐसी खुली किताब हैं अनपढ़ जिसे पढ़ लें
चलते हुए चैनल हैं हम अखबार नहीं हैं।

चाबी के खिलौने हैं हम लकड़ी के झुनझुने
हम मूंठ हैं केवल कोई तलवार नहीं हैं।

इक बच्चा भी कहता है कि बाबा बनो घोड़ा
हम शौक से कहते हैं कि इंकार नहीं है।

17.02.11

Sunday, February 6, 2011

खूबसूरत हैं रियाया हिरनें

वार छुप छुप के किए जाते हैं
हम शिकारी हैं सच बताते हैं।

हर झपट्टा है पूरी ताक़त का
हम कभी मुफ़्त का ना खाते हैं।

खूबसूरत हैं रियाया हिरनें
भूख में हम ये भूल जाते हैं।

हम नहीं कहते कि डरकर रहिए
कब किसे आंख हम दिखाते हैं।

सारा जंगल है ख़ौफ़ का आलम
जो हैं गीदड़ वही बताते हैं।

हम सभी वक़्त के निवाले हैं
राहे दुनिया में आते जाते हैं।

मौक़ा ताक़त जुनूनोशौक़ोहवस
लफ़्ज़ सारे हमी बनाते हैं।।
06/07.02.11

Saturday, January 1, 2011

इश्क़ की ताज़ा कहानी बन

दोस्तों ! नया साल मुबारक !!

न तू इमदाद बन ,न तरस खा , ना मेहरबानी बन।
न आंसू की ज़ुबां बन , दर्द की ना तर्जुमानी बन।।

न बनना हीर ,लैला ,तू कभी ना सोहणी ,शीरीं ,
अगर सच्चा है दिल तो इश्क़ की ताज़ा कहानी बन।।

कि रो लेने दे सदियों या हज़ारों साल नर्गिस को ,
न झूठी खै़रख़्वाही बन ,न झूठी निगहबानी बन।।

उम्मीदों के यहां पर आसमां गुमनाम होते हैं ,
किसी ख़ामोश कोशिश की कभी ना नातवानी बन।।

यहां नक़ली मुखौटा ओढ़ना तहज़ीब है ‘ज़ाहिद’ ,
तू अपनी सादगी में रह , न झूठी बदगुमानी बन।।
24-25.02.10

इमदाद - सहायता
तर्जुमानी - अनुवादकला ,भाषान्तरण,
ख़ैरख़्वाही - शुभचिंतकत्व ,
नातवानी - क्षीण मनोबल ,हीनताबोध
तहजीब - सभ्यता ,
बदगुमानी - दर्प , अहंकार

Sunday, December 26, 2010

सूइयां घड़ियों की

ग़ज़ल की दुनिया में पांव पांव चलते मुझे यह नगीना मिला है ...इसे तस्बीह के मनकों की तरह इन दिनों फेर रहा हूं.हसरत है कि अदब के जौहरियो को भी अपनी हालत दिखाऊं..बस पेश है जनाब कृश्नकुमार नाज़ साहब की ग़ज़ल,





शाम का वक्त है शाख़ों को हिलाता क्यों है ?
तू थके मांदे परिन्दों को उड़ाता क्यों है ?

वक्त को कौन भला रोक सका है पगले ,
सूइयां घड़ियों की तू पीछे घुमाता क्यों है ?

स्वाद कैसा है पसीने का , ये मज़दूर से पूछ
छांव में बैठ के अंदाज लगाता क्यों है ?

मुझको सीने से लगाने में है तौहीन अगर
दोस्ती के लिए फिर हाथ बढ़ाता क्यों है ?

प्यार के रूप हैं सब , त्याग तपस्या पूजा
इनमें अंतर का कोई प्रश्न उठाता क्यों है ?

मुस्कुराना है मेरे होंठों की आदत में शुमार
इसका मतलब मेरे सुख दुख से लगाता क्यों है ?

देखना चैन से सोना न कभी होगा नसीब
ख़्वाब की तू कोई तस्वीर बनाता क्यों है ?
कृष्ण कुमार ‘नाज़’